हिमाचल के ट्राइबल इलाकों में विकास की रफ्तार, सरकार ने खोला योजनाओं का पिटारा
शिमला: हिमाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों की तस्वीर अब तेजी से बदलती नजर आ रही है। एक समय में जिन इलाकों तक कभी बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था, वहां अब शिक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल कनेक्टिविटी, पर्यटन, महिला सशक्तिकरण और रोजगार के नए अवसरों का विस्तार हो रहा है। प्रदेश सरकार का दावा है कि लाहौल-स्पीति, किन्नौर, पांगी और भरमौर जैसे दुर्गम क्षेत्रों में आधारभूत ढांचे को मजबूत करने के साथ-साथ लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए बड़े पैमाने पर योजनाएं लागू की जा रही हैं।
प्रदेश सरकार के अनुसार, हिमाचल के जनजातीय क्षेत्र राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 42।49 फीसदी हिस्सा हैं, जबकि यहां प्रदेश की कुल आबादी का केवल 5।71 फीसदी निवास करता है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और कम जनसंख्या घनत्व के बावजूद सभी स्थायी और मौसमी जनजातीय बस्तियों तक बिजली और सुरक्षित पेयजल की सुविधा पहुंचाई जा चुकी है।
बजट का 9 फीसदी हिस्सा ट्राइबल पर खर्च
सरकार हर वर्ष अपनी विकास योजनाओं के कुल बजट का 9 फीसदी हिस्सा ट्राइबल सब-प्लान (एसटीपी) के तहत खर्च कर रही है। वर्ष 2024-25 में 890।28 करोड़ रुपये और 2025-26 में 638।73 करोड़ रुपये जनजातीय विकास के लिए आवंटित किए गए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में वर्ष 2025-26 के दौरान 3,361 विद्यार्थियों को प्री-मैट्रिक, 5,693 विद्यार्थियों को पोस्ट-मैट्रिक और 304 मेधावी विद्यार्थियों को मेरिट स्कॉलरशिप प्रदान की गई। प्रदेश के चार एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों में 1,008 विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं, जबकि छात्रावास, पुस्तकालय और शिक्षकों के आवास जैसी सुविधाओं का भी विस्तार किया जा रहा है।
स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए जनजातीय क्षेत्रों में दो जिला अस्पताल, छह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 49 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 123 स्वास्थ्य उपकेंद्र कार्यरत हैं। लाहौल-स्पीति और भरमौर में आदर्श स्वास्थ्य संस्थानों की स्थापना के साथ एमआरआई, सीटी स्कैन और आधुनिक जांच सुविधाएं उपलब्ध करवाई गई हैं, जिससे लोगों को बेहतर इलाज के लिए दूर नहीं जाना पड़ रहा।
3,234 महिलाएं लखपति दीदी
रोजगार और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए मुख्यमंत्री कृषि संवर्धन योजना के तहत किसानों को प्रमाणित बीज और उर्वरक उपलब्ध कराए गए हैं। पिछले तीन वर्षों में 815 जनजातीय युवाओं को प्रशिक्षण दिया गया, जिनमें से 577 युवाओं ने रोजगार प्राप्त किया या स्वयं का व्यवसाय शुरू किया। वहीं, 2025-26 के दौरान 6,576 युवाओं ने रोजगार कार्यालयों में पंजीकरण कराया।
महिला सशक्तिकरण की दिशा में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से 3,234 महिलाएं 'लखपति दीदी' बन चुकी हैं। वहीं, पात्र महिलाओं को इंदिरा गांधी प्यारी बहना सुख सम्मान निधि योजना के तहत हर महीने 1,500 रुपये की वित्तीय सहायता भी दी जा रही है। सरकार पर्यटन और नवीकरणीय ऊर्जा को भी जनजातीय क्षेत्रों की आर्थिक मजबूती का आधार बना रही है। होम-स्टे परियोजनाओं और निजी भूमि पर सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने के लिए पांच प्रतिशत ब्याज अनुदान दिया जा रहा है। वहीं, पांगी घाटी को प्रदेश का पहला प्राकृतिक खेती उपमंडल घोषित कर प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा दिया गया है।
705 पंचायतें डिजिटल नेटवर्क से जुड़ी
डिजिटल कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए भारतनेट परियोजना के तहत 3,793 किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर बिछाई गई है, जिससे 705 ग्राम पंचायतें डिजिटल नेटवर्क से जुड़ चुकी हैं। इससे ई-गवर्नेंस, टेलीमेडिसिन, ऑनलाइन शिक्षा और बैंकिंग सेवाओं का लाभ दूरदराज के गांवों तक पहुंच रहा है। इसके अलावा धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान के तहत प्रदेश के 10 जिलों के 270 गांवों का चयन कर विभिन्न केंद्रीय योजनाओं के माध्यम से आधारभूत सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है।
सरकार का कहना है कि विकास के साथ-साथ जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण पर भी समान रूप से ध्यान दिया जा रहा है। सरकार का दावा है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पर्यटन, डिजिटल कनेक्टिविटी, महिला सशक्तिकरण और सतत आजीविका के क्षेत्र में किए जा रहे निवेश से जनजातीय क्षेत्रों में विकास की नई इबारत लिखी जा रही है और इन दुर्गम इलाकों के लोगों का जीवन लगातार बेहतर हो रहा है।






