सुप्रीम कोर्ट का फैसला बरकरार, लेकिन हक अब भी अधूरा! जमीन-मुआवजे के इंतजार में मीर बक्श
मंडी: बहुचर्चित मीर बक्श भूमि विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुनर्विचार याचिका खारिज किए जाने के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। शीर्ष अदालत ने दिव्यांशु राणा की ओर से दायर पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए 19 जुलाई 2023 के अपने फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले की समीक्षा का कोई आधार नहीं बनता और लंबित अंतरिम आवेदनों का भी निपटारा कर दिया गया है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को करीब तीन वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन जमीन मालिक मीर बक्श का कहना है कि आज तक उन्हें न तो उनकी भूमि वापस मिली है और न ही मुआवजे को लेकर कोई अंतिम समाधान निकल पाया है। उनका आरोप है कि उनकी मूल भूमि विभिन्न सरकारी परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल की जा चुकी है, जिसके बदले उन्हें समुचित भूमि या उचित मुआवजा दिया जाना चाहिए।
क्या है पूरा मामला?
भारत विभाजन के बाद वर्ष 1957 में नेरचौक-भंगरोटू क्षेत्र की करीब 110 बीघा भूमि को प्रशासन ने विस्थापित संपत्ति मानते हुए अपने कब्जे में ले लिया था। मीर बक्श और अन्य उत्तराधिकारियों का दावा था कि उनका परिवार कभी पाकिस्तान नहीं गया, इसलिए भूमि का अधिग्रहण अवैध था। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया।
फैसले के बाद उत्तराधिकारियों ने 110 बीघा भूमि के बदले करीब 1061 करोड़ रुपये मुआवजे की मांग की है। प्रशासन की ओर से मंडी, सुंदरनगर, बल्ह और नाचन क्षेत्रों में भूमि चिह्नित की गई है और कई दौर की बातचीत भी हो चुकी है। मीर बक्श का कहना है कि यदि पूरी जमीन देना संभव नहीं है तो आधी जमीन और आधा मुआवजा देने के विकल्प पर भी विचार किया जा सकता है।
मामले के लगातार लंबित रहने से नाराज मीर बक्श ने अब हाईकोर्ट का रुख किया है। उनका कहना है कि अदालत के आदेश के बावजूद फैसला धरातल पर लागू नहीं हो पाया है और सरकार को इस मामले में समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।






