चंबा के नए बस स्टैंड की दीवारों पर बोल उठी विरासत
चंबा अब सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक अनुभव बनता जा रहा है। इसका सबसे ताजा उदाहरण है चंबा का नया बस स्टैंड, जो अब सिर्फ एक यात्री प्रतीक्षालय नहीं, बल्कि एक खुला सांस्कृतिक संग्रहालय बन चुका है। यहां की दीवारों पर उकेरे गए लोकजीवन, ऐतिहासिक धरोहर, क्षेत्रीय परंपराएं, त्यौहार, लोकभाषाएं और खानपान सब कुछ यात्रियों को चंबा की आत्मा से जोडऩे का काम कर रहे हैं। इस अनूठी पहल की कल्पना और नेतृत्व किया है जिला भाषा अधिकारी तुर्केश शर्मा ने, जिनकी सांस्कृतिक दृष्टि और दूरदर्शी सोच ने इस परियोजना को वास्तविक रूप दिया। स्थानीय प्रशासन, भाषा एवं संस्कृति विभाग और चंबा के स्थानीय कलाकारों के सामूहिक प्रयासों ने चंबा को एक नया, रंगीन और जीवंत रूप दिया है। नए बस स्टैंड की हर दीवार अब एक कहानी कह रही है चंबा की। चुराह, पांगी, भरमौर और चंबा के सांस्कृतिक पहलुओं को दीवारों पर जिस सजीवता से चित्रित किया गया है, वह दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती है। स्थानीय खानपान, पारंपरिक वेशभूषा, प्रमुख मंदिर, ऐतिहासिक स्थल, पर्यटन स्थल और उन तक की दूरी यह सब चित्रों और सूचनाओं के साथ दर्शाया गया है ताकि हर आगंतुक को चंबा के हर हिस्से की जानकारी एक नजर में मिल सके। चंबा के उपायुक्त मुकेश रेपसवाल के अनुसार यह कार्य अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेले की प्रारंभिक गतिविधियों का हिस्सा है। इसके अंतर्गत चंबा के प्रमुख स्थानों का सौंदर्यीकरण किया जा रहा है। नया बस स्टैंड, जो चंबा का प्रमुख प्रवेश द्वार है, वहां जिले की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और इतिहास को चित्रों के माध्यम से दर्शाया जा रहा है। इस प्रकार की कला-संस्कृति आधारित परियोजना को जल्द ही चौवाड़ी और डलहौज़ी जैसे अन्य विधानसभा क्षेत्रों के प्रवेशद्वारों पर भी लागू किया जाएगा। इस सांस्कृतिक चित्रगाथा में एक विशेष स्थान चंबा के गौरवपूर्ण लोक उत्सव - सुही माता मेले को भी दिया गया है। दीवारों पर न केवल इस मेले के दृश्य चित्रित किए गए हैं, बल्कि सुही माता की बलिदान गाथा को भी कलात्मक रूप में उकेरा गया है — जहां एक रानी ने अपने नगरवासियों की प्यास बुझाने के लिए स्वयं का बलिदान दे दिया। यह लोककथा अब रंगों के माध्यम से आने वाले हर पर्यटक के हृदय तक पहुंचेगी। इस अभूतपूर्व परियोजना का सबसे प्रेरणादायक पक्ष रहा है - स्थानीय कलाकारों को केंद्र में स्थान देना। इन कलाकारों ने अपनी कला से चंबा की आत्मा को दीवारों पर उकेर दिया है। जिन्होंने दिन-रात मेहनत करके इस सपने को साकार किया, वे हैं परीक्षित शर्मा, ज्योति नाथ, हिमानी नाथ, कैफ, लक्ष्मण, लेखराज, देवेश, गजेन्द्र, लोकेन्द्र, साहिल और अज्जू।
हर चित्र में हमने अपने चंबा को महसूस किया: चौहान
इस टीम का नेतृत्व कर रहे लेखराज चौहान ने बताया कि हमारे लिए यह एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि हमारी मिट्टी की पहचान को उकेरने का अवसर था। हर चित्र में हमने अपने चंबा को महसूस किया और उसे दीवारों पर जिया है। हमें गर्व है कि हमें यह मौका मिला।
संस्कृति को सहेजने का नया तरीका
यह प्रयास न केवल एक सौंदर्यात्मक प्रोजेक्ट है, बल्कि यह स्थानीय संस्कृति, कला और प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने की एक गहरी सोच से जुड़ा है। इससे ना सिर्फ पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि स्थानीय कलाकारों को रोज़गार और पहचान भी मिलेगी।
यात्री यहां की मिट्टी और संस्कृति के इतिहास से महसूस करे जुड़ाव
जिला भाषा अधिकारी तुर्केश शर्मा का कहना है कि हम चाहते थे कि जो यात्री चंबा पहुंचे, वह यहां की मिट्टी, संस्कृति और इतिहास से जुड़ाव महसूस करे। सुही माता मेला हो या भरमौर की भेषभूषा, हर चित्र का उद्देश्य यही है चंबा को चंबा की नजर से दिखाना।












