विकास या दिखावा? धनोटू रेस्ट हाउस ने खोली सिस्टम की पोल
हिमाचल प्रदेश में विकास कार्यों के नाम पर होने वाले उद्घाटन अक्सर सुर्खियां तो बटोर लेते हैं, लेकिन उनकी असली परीक्षा समय के साथ ज़मीनी स्तर पर होती है। मंडी जिले के धनोटू में बना रेस्ट हाउस इसी सच्चाई का एक उदाहरण बनकर सामने आया है जहां उद्घाटन तो हो गया, पर सुविधा आज भी इंतज़ार में है।
यह मामला केवल एक भवन की बदहाली का नहीं है, बल्कि यह उस प्रशासनिक सोच पर सवाल खड़ा करता है, जहां योजनाओं का उद्देश्य जनसेवा से ज्यादा राजनीतिक उपलब्धि दिखाना बन जाता है। जब किसी रेस्ट हाउस में बुनियादी सुविधाएं..जैसे पानी, बिजली, फर्नीचर और स्टाफ ही उपलब्ध न हों, तो उसका उद्घाटन करना क्या केवल औपचारिकता नहीं बनकर रह जाता?
प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार पर इस मामले में सवाल उठना स्वाभाविक है, क्योंकि जनता अब केवल घोषणाओं और फीता काटने की राजनीति से आगे बढ़कर परिणाम चाहती है। वहीं, यह भी सच है कि इस रेस्ट हाउस का निर्माण पूर्व जयराम ठाकुर सरकार के कार्यकाल में हुआ था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या केवल एक सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था की निरंतरता में मौजूद खामियों को दर्शाती है।
धनोटू रेस्ट हाउस की स्थिति यह भी बताती है कि योजनाओं के निर्माण से पहले उनकी उपयोगिता, रखरखाव और दीर्घकालिक संचालन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। परिणामस्वरूप करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी ऐसी संपत्तियां ‘शोपीस’ बनकर रह जाती हैं जो न केवल संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि जनता के विश्वास पर भी चोट है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक और चिंताजनक पहलू है...परिसर की गंदगी और बदहाल हालत। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति उदासीनता का भी संकेत है। एक सार्वजनिक स्थल का इस तरह कूड़े के ढेर में तब्दील हो जाना यह दर्शाता है कि निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था कितनी कमजोर है।
आज जरूरत है कि सरकारें उद्घाटन की राजनीति से ऊपर उठकर “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” यानी टिकाऊ विकास पर ध्यान दें। हर परियोजना के साथ उसकी मेंटेनेंस प्लानिंग, स्टाफिंग और नियमित मॉनिटरिंग को अनिवार्य बनाया जाए। साथ ही, स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित कर ऐसी संपत्तियों को जीवंत बनाया जाए, न कि उन्हें उपेक्षा का शिकार होने दिया जाए।
धनोटू रेस्ट हाउस सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि एक आईना है—जो यह दिखा रहा है कि विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितनी दूरी है। अब देखना यह है कि सरकार इस आईने में खुद को देखकर सुधार की दिशा में कदम उठाती है या फिर यह रेस्ट हाउस यूं ही राजनीति की भेंट चढ़ता रहेगा।












