हिमाचल की करोड़ों की ई-बसें शुरुआत में ही फेल! ट्राले से उतरते ही आई तकनीकी खराबी
सोलन। हिमाचल प्रदेश में करोड़ों रुपये खर्च कर शुरू की गई इलेक्ट्रिक बस परियोजना एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। जिन नई ई-बसों को भविष्य की “ग्रीन ट्रांसपोर्ट क्रांति” बताया जा रहा था, वे सड़क पर उतरने से पहले ही तकनीकी दिक्कतों में फंसती नजर आ रही हैं। सोलन पहुंची नई इलेक्ट्रिक बसें पिछले तीन दिनों से ट्रालों पर ही खड़ी हैं। सोमवार को जब कंपनी के चालक इन्हें डिपो के रैंप से नीचे उतारने पहुंचे, तो बसें बार-बार बंद होने लगीं। इससे एचआरटीसी की तैयारियों और कंपनी के बड़े दावों पर सवाल उठने लगे हैं।
हैरानी की बात यह है कि कंपनी ने पहले ही दावा किया था कि बसों की सभी तकनीकी खामियां दूर कर दी गई हैं और वाहन पूरी तरह परिचालन के लिए तैयार हैं। लेकिन जैसे ही अनलोडिंग की प्रक्रिया शुरू हुई, बसों में स्टार्ट-स्टॉप की समस्या सामने आ गई। पहले रैंप की व्यवस्था न होने से देरी हुई और जब रैंप तैयार हुआ, तब तकनीकी खराबी ने पूरी प्रक्रिया रोक दी। फिलहाल कंपनी की तकनीकी टीम बसों की जांच में जुटी हुई है।
सोलन में पहुंची 11 नई ई-बसों का ट्रायल शिमला, कांगड़ा और हमीरपुर रूट पर किया जाना प्रस्तावित है। मगर शुरुआत में ही सामने आई तकनीकी दिक्कतों ने भविष्य के संचालन को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
पुरानी ई-बसों का भी बुरा हाल
नई बसों की परेशानी के बीच राजधानी शिमला में पहले से खरीदी गई इलेक्ट्रिक बसों की स्थिति भी चिंता पैदा कर रही है। वर्ष 2018-19 में एचआरटीसी के बेड़े में शामिल की गई इलेक्ट्रिक बसों में से एक दर्जन से अधिक बसें लंबे समय से खराब होकर खड़ी हैं। कई बसें केवल इसलिए नहीं चल पा रहीं क्योंकि उनके जरूरी कलपुर्जे उपलब्ध नहीं हो रहे।
एचआरटीसी के पास शुरुआत में खरीदी गई 50 ई-बसों में से करीब 25 से 30 बसों में समय-समय पर तकनीकी खराबियां आईं। वर्कशॉप स्तर पर जितनी मरम्मत संभव थी, उतनी बसों को ठीक कर सड़कों पर चलाया जा रहा है, लेकिन करीब 12 बसें ऐसी हैं जो पूरी तरह बंद पड़ी हैं।
अब परिवहन निगम इन्हीं बसों को दोबारा सड़क पर लाने के लिए कंपनी के साथ छह साल का मेंटेनेंस करार करने जा रहा है। प्रस्तावित समझौते के तहत कंपनी के मैकेनिक ही बसों की मरम्मत और रखरखाव करेंगे, जबकि निगम तय शर्तों के अनुसार भुगतान करेगा। अधिकारियों के अनुसार करार को लेकर बातचीत अंतिम चरण में है और जल्द वार्षिक मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट साइन किया जा सकता है।
बड़ा सवाल: क्या हिमाचल ई-बस मॉडल तैयार हुए बिना लागू कर दिया गया?
नई बसों का ट्राले से नीचे न उतर पाना और पुरानी बसों का सालों तक वर्कशॉप में खड़ा रहना इस बात की तरफ इशारा कर रहा है कि हिमाचल में ई-बस मॉडल को लेकर आधारभूत तैयारी अभी भी अधूरी है। चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सपोर्ट और लंबी अवधि के रखरखाव जैसे मुद्दे शुरुआत से ही चुनौती बने हुए हैं।
ग्रीन ट्रांसपोर्ट के बड़े दावों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या करोड़ों रुपये खर्च करने से पहले सिस्टम को संचालन और रखरखाव के स्तर पर पूरी तरह तैयार किया गया था, या फिर परियोजना जल्दबाजी में जमीन पर उतार दी गई?






