भारत को सस्ते कच्चे तेल की खरीद में बड़ा झटका लगा है। अमेरिका ने रूस और ईरान से तेल आयात पर दी गई अस्थायी छूट को आगे बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया है। इस फैसले के बाद अब इन देशों से तेल खरीदने पर प्रतिबंध और सख्त हो जाएंगे।
दरअसल, यह छूट उन तेल खेपों के लिए दी गई थी जो पहले ही भेजी जा चुकी थीं, लेकिन अब इसकी अवधि खत्म होने जा रही है और अमेरिका ने इसे आगे बढ़ाने से मना कर दिया है। ऐसे में भारत जैसे देशों के लिए सस्ते तेल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
भारत पिछले कुछ समय से रूस से रियायती दरों पर बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहा था, जिससे घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिल रही थी। लेकिन अब इस फैसले के बाद भारतीय रिफाइनरियों को दूसरे देशों से महंगे दामों पर तेल खरीदना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है, जिससे आम लोगों की जेब पर बोझ बढ़ने की आशंका है। वहीं, वैश्विक तेल बाजार में भी इस फैसले से अस्थिरता बढ़ सकती है।
कुल मिलाकर, अमेरिका के इस कदम ने भारत की ऊर्जा रणनीति के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है और आने वाले समय में तेल की कीमतों पर सबकी नजरें बनी रहेंगी।
अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते दुनियाभर में तेल की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने और मिडिल ईस्ट में तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं। इस संकट के बीच अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने मार्च 2026 में रूस और ईरान से तेल खरीद पर लगे प्रतिबंधों में अस्थायी छूट दी। यह छूट केवल 30 दिनों के लिए थी, जो अब समाप्त हो चुकी है। भारत को इस व्यवस्था से खास राहत मिली थी, क्योंकि वह रूस से सस्ता तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर रहा था।
US के वित्त मंत्री ने क्या कहा?
हालांकि अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि वाशिंगटन इन प्रतिबंधों में छूट की अवधि नहीं बढ़ाएगा। बेसेंट ने कहा, “हम रूसी और ईरानी तेल के लिए जनरल लाइसेंस का रिन्यूवल नहीं करेंगे। 11 मार्च से पहले जो तेल जहाजों पर लदा था या रास्ते में था, उसे बेचने की इजाजत दी गई थी। वह सारा पुराना तेल अब इस्तेमाल हो चुका है या बिक चुका है।”
मार्च में दी थी छूट
बता दें कि यह छूट 12 मार्च 2026 को दी गई थी, जो 11 अप्रैल 2026 को खत्म हुई। इस दौरान भारतीय रिफाइनरियां पहले से लदे रूसी क्रूड को खरीद सकीं, जिससे वैश्विक बाजार में तेल की कमी का असर कुछ हद तक कम हुआ। बेसेंट ने पहले भी जोर दिया था कि यह “डिलिबरेटली शॉर्ट-टर्म” व्यवस्था है, जो रूस को बड़ा वित्तीय फायदा नहीं पहुंचाएगी। इसका मकसद सिर्फ संकट की घड़ी में सप्लाई बनाए रखना था, न कि स्थायी राहत देना।
ट्रंप प्रशासन की यह नीति अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के अनुरूप है, जिसमें भारत ने रूसी तेल खरीद सीमित करने का संकेत दिया था। छूट के बावजूद भारत अमेरिकी और वेनेजुएला तेल की खरीद बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। हालांकि, युद्ध के कारण वैश्विक कीमतें ऊंची बनी हुई हैं, जिससे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर दबाव है। भारत अपनी 85% तेल जरूरतें आयात से पूरी करता है और रूस लंबे समय से उसका प्रमुख आपूर्तिकर्ता रहा है।
अब डेडलाइन खत्म होने के बाद भारत के सामने चुनौतियां बढ़ गई हैं। अगर नई खरीद पर पूरे प्रतिबंध लागू होते हैं तो महंगा तेल खरीदना पड़ सकता है, जिसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर पड़ेगा