दिवाली पर चौहार और छोटाभंगाल घाटी में एक मिसाल: पटाखों से तौबा, दीयों से रोशन हुआ पर्व
चौहार और छोटाभंगाल घाटियों में इस वर्ष भी दिवाली का पर्व पारंपरिक उत्साह और पर्यावरणीय चेतना के साथ मनाया गया। घाटी के लोगों ने वर्षों पूर्व हुई भीषण आगजनी की घटनाओं से सबक लेते हुए दीयों की रोशनी के बीच पटाखों से तौबा की और सुरक्षित, शांत दिवाली मनाई। खासकर बच्चों में दिवाली को लेकर भारी उत्साह था, मगर समाजसेवक और पूर्व सूबेदार रामसरन चौहान की वर्षों से चल रही मुहिम रंग लाई। उन्होंने इस बार भी लगातार लोगों को पटाखे न फोड़ने के लिए प्रेरित किया। घाटी के अधिकतर गांवों में पटाखों पर स्वैच्छिक प्रतिबंध देखने को मिला। कुछ निचले क्षेत्रों में बच्चों ने भी अगर पटाखे चलाए तो वह गाँव से दूर, सुरक्षित स्थानों पर ही। चौहान ने कहा कि दिवाली का असली प्रकाश घी के दीयों से होता है, न कि बाजार की बिजली की लड़ियों से। उन्होंने धन की बर्बादी और पर्यावरण प्रदूषण से बचने की सलाह दी। इसी परंपरा को निभाते हुए थुजी गांव के बुद्धिजीवी सिंह ने बताया कि वे वर्षों से घर को केवल घी के दीयों से ही रोशन करते आ रहे हैं।












