8 साल से कोमा में जिंदगी से जंग लड़ रहा संजीव, सहारा योजना बंद होने से परिवार बेहाल
पत्नी और 42% दिव्यांग बेटे के सहारे चल रही जिंदगी, मदद की आस में दर-दर भटक रहा परिवार
हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के हरोली उपमंडल के लूथड़े गांव का एक परिवार पिछले 8 वर्षों से दर्द, संघर्ष और मजबूरी की जिंदगी जी रहा है। 48 वर्षीय संजीव कुमार पिछले आठ साल से कोमा में हैं और बिस्तर पर जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं।
बेटा खुद 42 प्रतिशत दिव्यांग
संजीव की देखभाल उनकी पत्नी मोनिका और बेटा मोहित शर्मा कर रहे हैं, जो खुद 42 प्रतिशत दिव्यांग हैं। बावजूद इसके, दोनों दिन-रात उनकी सेवा में लगे हुए हैं। यह परिवार हर दिन नई चुनौतियों का सामना कर रहा है, लेकिन हालात के आगे हार मानने को तैयार नहीं है।
मोनिका बताती हैं कि करीब आठ साल पहले उनके पति डिप्रेशन से जूझ रहे थे। इसी दौरान एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद उनकी हालत इतनी बिगड़ गई कि वे कोमा में चले गए। उन्हें इलाज के लिए PGI चंडीगढ़ ले जाया गया, जहां लंबे समय तक उपचार चला। बाद में डॉक्टरों ने घर पर ही देखभाल करने की सलाह दी। तब से लेकर आज तक संजीव बिस्तर पर हैं और परिवार ही उनका एकमात्र सहारा बना हुआ है।
इलाज में खर्च हो चुकी जमा-पूंजी
इस लंबी बीमारी ने परिवार की आर्थिक स्थिति पूरी तरह से तोड़कर रख दी है। इलाज में उनकी सारी जमा-पूंजी खर्च हो चुकी है। रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों से मदद लेकर किसी तरह गुजारा किया गया, लेकिन अब हालत यह है कि रोजमर्रा का खर्च और दवाइयों की व्यवस्था करना भी बेहद मुश्किल हो गया है।
हर महीने करीब 5 हजार रुपये दवाइयों और देखभाल पर खर्च हो जाते हैं, जबकि आय का कोई स्थायी साधन नहीं है। इतना ही नहीं, परिवार के पास अपना घर भी नहीं है और वे रिश्तेदारों के सहारे रहने को मजबूर हैं।
यहीं खत्म नहीं होतीं परिवार की मुश्किलें
परिवार की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं। मोनिका बताती हैं कि उन्हें सरकार की सहारा योजना के तहत हर महीने 2 हजार रुपये की पेंशन मिलती थी, जिससे कुछ राहत मिल जाती थी। लेकिन पिछले एक साल से यह पेंशन बंद पड़ी है। कई बार विभागों के चक्कर काटने के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हो पाया है, जिससे परिवार की परेशानियां और भी बढ़ गई हैं।
अब यह परिवार सरकार और प्रशासन से गुहार लगा रहा है कि उनकी स्थिति को देखते हुए सहारा योजना की पेंशन दोबारा शुरू की जाए या उन्हें किसी अन्य माध्यम से आर्थिक सहायता दी जाए, ताकि वे संजीव के इलाज और अपने जीवन-यापन को किसी तरह जारी रख सकें।
यह मामला न सिर्फ एक परिवार की पीड़ा को दिखाता है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करता है कि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए चल रही योजनाओं का बंद होना कितना बड़ा असर डाल सकता है। अब देखना होगा कि सरकार इस पीड़ित परिवार की पुकार पर कब तक ध्यान देती है।












