सुक्खू सरकार को HC से बड़ा झटका, नगर निकायों में अध्यक्ष-उपाध्यक्ष चुनाव में विधायकों की वोटिंग पर रोक
शिमला। हिमाचल प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार को शहरी निकायों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की उस अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसके तहत स्थानीय विधायकों को नगर निगमों और नगर परिषदों में अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के चुनाव में मतदान का अधिकार दिया गया था। अदालत के इस आदेश के बाद फिलहाल विधायक इन चुनावों में वोट नहीं डाल सकेंगे।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ, न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा ने विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश जारी किया। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 17 जून को निर्धारित की है। ऐसे में प्रदेश के कई नगर निकायों में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनावों को लेकर नई स्थिति पैदा हो गई है।
सरकार ने 2023 में दिया था मतदान का अधिकार
प्रदेश सरकार ने 13 जुलाई 2023 को एक अधिसूचना जारी कर स्थानीय विधायकों को नगर निगमों और नगर परिषदों में अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष के चुनाव में मतदान का अधिकार प्रदान किया था। सरकार का तर्क था कि विधायक संबंधित शहरी निकायों के प्रतिनिधि होते हैं और विकास कार्यों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है, इसलिए उन्हें भी मतदान का अधिकार मिलना चाहिए।
हालांकि सरकार के इस फैसले को कई निर्वाचित पार्षदों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव केवल जनता द्वारा चुने गए पार्षदों का विशेषाधिकार है। विधायक या नामित सदस्य सामान्य बैठकों और विकास कार्यों से जुड़े प्रस्तावों में अपनी भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन निकाय के शीर्ष पदों के चुनाव में मतदान का अधिकार उन्हें नहीं दिया जा सकता।
विधायक का एक वोट बदल सकता था पूरा परिणाम
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नंद लाल ठाकुर ने अदालत में दलील दी कि प्रदेश के कई नगर निकायों में पार्षदों की संख्या बेहद कम होती है और कई बार मुकाबला बराबरी का रहता है। ऐसी स्थिति में विधायक का एक अतिरिक्त वोट चुनाव परिणाम को पूरी तरह बदल सकता है।
उन्होंने कहा कि इससे स्थानीय लोकतंत्र की मूल भावना प्रभावित होती है और जनता द्वारा चुने गए पार्षदों के अधिकार कमजोर पड़ते हैं। उनका तर्क था कि नगर निकायों की स्वायत्तता बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने दलीलों को माना प्रथम दृष्टया सही
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ताओं की दलीलों को उचित मानते हुए सरकार की अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगा दी। अदालत ने कहा कि नगर निकायों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव मुख्य रूप से निर्वाचित पार्षदों का अधिकार प्रतीत होता है और मामले की विस्तृत सुनवाई तक वर्तमान व्यवस्था पर रोक लगाना आवश्यक है।
राजनीतिक समीकरणों पर पड़ेगा असर
हाईकोर्ट के इस फैसले को प्रदेश की राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कई नगर परिषदों और नगर निगमों में अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के चुनाव निकट हैं और ऐसे में विधायकों के वोट पर रोक लगने से राजनीतिक दलों की रणनीति प्रभावित हो सकती है।
विशेष रूप से उन निकायों में जहां पार्षदों का संख्या बल लगभग बराबर है, वहां चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं। अब प्रदेश की राजनीतिक पार्टियों और नगर निकायों की नजरें 17 जून को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस मामले की आगे की दिशा और अंतिम निर्णय का रास्ता तय होगा।
फिलहाल हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश ने साफ कर दिया है कि नगर निगमों और नगर परिषदों में अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के चुनाव में विधायकों की भूमिका पर अंतिम फैसला आने तक रोक बनी रहेगी।






