पोंग बांध विस्थापितों के लिए आखिरी मौका, 830 लंबित मुरब्बा मामलों में मांगे दावे
कांगड़ा: पोंग बांध विस्थापित परिवारों के लिए महत्वपूर्ण खबर है। करीब 53 वर्षों से अपने पुश्तैनी हक का इंतजार कर रहे परिवारों को अब अंतिम अवसर दिया गया है। डीसी आरएंडआर कार्यालय, राजा का तालाब ने 830 लंबित मुरब्बा (भूमि) आवंटन मामलों में पात्र विस्थापितों और उनके वैध वारिसों से दावे आमंत्रित किए हैं। विभाग ने स्पष्ट किया है कि निर्धारित समय सीमा के भीतर दावा प्रस्तुत नहीं करने पर संबंधित मामलों में भूमि आवंटन की प्रक्रिया हमेशा के लिए बंद कर दी जाएगी।
वैध वारिसों से मांगे गए आवेदन
आरएंडआर कार्यालय ने 830 लंबित मामलों की अंतिम सूची जारी कर दी है, जिसे जिला उपायुक्त कांगड़ा की आधिकारिक वेबसाइट पर भी उपलब्ध कराया गया है। पात्र विस्थापितों और उनके वैध वारिसों से आवश्यक दस्तावेजों के साथ समय पर आवेदन करने की अपील की गई है।
डिप्टी कमिश्नर (आरएंडआर) कुलबीर सिंह राणा ने कहा कि यह पात्र परिवारों के लिए अंतिम अवसर है। उन्होंने सभी पात्र लोगों से तय समय सीमा के भीतर अपना दावा प्रस्तुत करने का आग्रह किया है।
अब भी हजारों मुरब्बों का आवंटन बाकी
साल 1973 में पोंग बांध बनने से 20,722 परिवार विस्थापित हुए थे, जिनमें 16,352 परिवारों को पात्र माना गया। अब तक विभिन्न चरणों में करीब 10 हजार परिवारों को राजस्थान में मुरब्बे आवंटित किए जा चुके हैं। वर्ष 2026 में भी करीब 400 परिवारों को भूमि मिली, लेकिन 5,418 मुरब्बों का आवंटन अभी भी लंबित है।
वारिसों के लिए आखिरी अवसर
आरएंडआर कार्यालय के अनुसार अधिकांश मूल दावेदारों का निधन हो चुका है और उनके वैध वारिस देश के अलग-अलग राज्यों में रह रहे हैं। सार्वजनिक सूचना जारी होने के बाद अब तक केवल 30 से 40 परिवारों ने ही अपने दावे प्रस्तुत किए हैं। ऐसे में विभाग ने अंतिम सूची जारी कर सभी पात्र परिवारों को आखिरी मौका दिया है।
डिप्टी कमिश्नर कुलबीर सिंह राणा ने कहा कि यदि निर्धारित समय के भीतर दावे प्राप्त नहीं होते हैं तो नियमानुसार संबंधित मामलों में मुरब्बा आवंटन की प्रक्रिया बंद करनी पड़ेगी। इसलिए सभी पात्र परिवार इस अवसर का लाभ उठाते हुए समय पर आवेदन करें।
करीब 53 साल पहले पोंग बांध के निर्माण से हजारों घर, खेत और पूरे गांव जलमग्न हो गए थे। आज भी कई परिवारों का पुनर्वास अधूरा है। ऐसे में 830 लंबित मामलों में दिया गया यह अंतिम अवसर हजारों विस्थापित परिवारों के लिए अपने पुश्तैनी अधिकार हासिल करने की उम्मीद बनकर सामने आया है।






