हिमाचल के शेरदिल 'गद्दी शीपडॉग' को मिली बड़ी पहचान, इंडियन नेशनल केनेल क्लब में हुआ आधिकारिक रजिस्ट्रेशन
हिमाचल प्रदेश की प्रसिद्ध स्वदेशी हिमालयन गद्दी (गद्दी शीपडॉग) नस्ल को बड़ी पहचान मिली है। इंडियन नेशनल केनेल क्लब ने इस नस्ल के दो कुत्तों स्कूबी और पुट्टी का आधिकारिक पंजीकरण कर दिया है। इसे हिमालयी गद्दी नस्ल के संरक्षण और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। यह पंजीकरण नेशनल ब्यूरो ऑफ एनिमल जेनेटिक रिसोर्सेज द्वारा हिमालयन गद्दी नस्ल को औपचारिक मान्यता दिए जाने के बाद संभव हुआ है
इससे अब इस स्वदेशी नस्ल को केनेल क्लब की आधिकारिक रजिस्ट्री में स्थान मिल गया है। डा. जीसी नेगी पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय के अधिष्ठाता डा पंकज सूद ने कहा कि यह उपलब्धि कालेज के वैज्ञानिकों के लगातार प्रयास का नतीजा है। इस पंजीकरण से भारतीय नस्ल के कुत्तों को लंबे समय से प्रतिक्षित पहचान मिली है।
भेड़-बकरियों की सुरक्षा
हिमालयन गद्दी कुत्ता हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र की पारंपरिक नस्ल है। इसका नाम गद्दी समुदाय के नाम पर पड़ा है, जो पीढिय़ों से भेड़-बकरियों की सुरक्षा के लिए इन कुत्तों का उपयोग करता आ रहा है। यह मध्यम से बड़े आकार का, मजबूत शरीर वाला पशुधन रक्षक कुत्ता है, जिसकी घनी फर ठंडे और कठिन पर्वतीय मौसम में सुरक्षा प्रदान करती है।
यह प्राय: काले-भूरे, ब्रिंडल अथवा पूरी तरह काले रंग में पाया जाता है। अपनी सतर्कता, साहस और क्षेत्रीय सुरक्षा की प्रवृत्ति के कारण यह नस्ल तेंदुए, भेडि़ए तथा अन्य जंगली जानवरों से पशुधन की रक्षा करने में सक्षम मानी जाती है। आज भी यह नस्ल मुख्य रूप से चरवाहों के साथ ऊंचाई वाले चरागाहों में काम करने वाले कुत्ते के रूप में जानी जाती है।
बाघ-तेंदुए भी खाते हैं खौफ
हिमालयन शीपडॉग (गद्दी कुत्ता) हिमाचल प्रदेश की एक बेहद साहसी और ताकतवर स्वदेशी नस्ल है, जिसे सदियों से गद्दी समुदाय अपने भेड़-बकरियों के झुंड की सुरक्षा के लिए पालता आ रहा है। अपनी असाधारण फुर्ती, मजबूत कद-काठी और निडर स्वभाव के कारण यह कुत्ता बाघ, तेंदुए और भालू जैसे खतरनाक जंगली जानवरों का भी डटकर सामना करने की क्षमता रखता है। यही वजह है कि हिमालयी क्षेत्रों में इसे पशुधन का सबसे भरोसेमंद रक्षक माना जाता है।






