हिमाचल सरकार को हाईकोर्ट से झटका, जनजातीय क्षेत्रों की पंचायतें भंग करने के फैसले पर लगाई रोक
शिमला। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के जनजातीय क्षेत्रों की पंचायती राज संस्थाओं को समय से पहले भंग करने के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रतिनिधियों को अपना पांच वर्ष का निर्धारित कार्यकाल पूरा करने का संवैधानिक अधिकार है और बिना पर्याप्त कानूनी आधार के उनके कार्यकाल में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने दीपक चौहान और अन्य निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने मौजूदा पंचायत प्रतिनिधियों को अगले आदेश तक अपने पदों पर बने रहने और सामान्य रूप से कार्य करने की अनुमति दे दी है।
दरअसल, हिमाचल प्रदेश सरकार ने 24 जून 2026 को एक अधिसूचना जारी कर लाहौल-स्पीति के केलंग और चंबा जिले के पांगी उपमंडल की पंचायतों, पंचायत समितियों और जिला परिषदों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया था। सरकार के इस फैसले को निर्वाचित प्रतिनिधियों ने हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा था कि उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले संस्थाओं को भंग करना लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है।
मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने सरकार की 24 जून की अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगाते हुए उसे अगले आदेश तक स्थगित कर दिया है। अदालत के इस फैसले से जनजातीय क्षेत्रों के निर्वाचित प्रतिनिधियों को बड़ी राहत मिली है। अब मामले की अगली सुनवाई और सरकार की ओर से पेश किए जाने वाले पक्ष पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।






