देश को रोशनी मिली, बिलासपुर को मिला विस्थापन का दर्द; 65 साल बाद भी क्यों अधूरा है पुनर्वास?
अनंत ज्ञान, डेस्क।
9 अगस्त 1961 सिर्फ बिलासपुर के इतिहास की एक तारीख नहीं है, बल्कि यह उस विकास मॉडल की याद दिलाने वाला दिन है, जिसकी कीमत हजारों परिवारों ने अपने घर, जमीन, संस्कृति और जड़ों से विस्थापित होकर चुकाई। आज पुराने बिलासपुर शहर को जलमग्न हुए 65 वर्ष पूरे हो गए हैं, लेकिन छह दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी भाखड़ा विस्थापितों का दर्द पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
भाखड़ा बांध ने निश्चित रूप से देश के विकास, सिंचाई और बिजली उत्पादन में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। इसे आधुनिक भारत के निर्माण की बड़ी परियोजनाओं में गिना गया। लेकिन किसी भी बड़े विकास कार्य का मूल्यांकन केवल उससे मिलने वाले आर्थिक लाभ से नहीं होना चाहिए। यह भी देखना जरूरी है कि उस विकास की कीमत किसने चुकाई और क्या उन लोगों को उनका उचित अधिकार मिला, जिनके जीवन की पूरी तस्वीर बदल गई।
पुराना बिलासपुर सिर्फ एक शहर नहीं था। वह कहलूर की ऐतिहासिक विरासत, सामाजिक रिश्तों, मंदिरों, जलस्रोतों, गलियों और पीढ़ियों की स्मृतियों का केंद्र था। आज वह सब गोबिंद सागर झील की गहराइयों में है। नई पीढ़ी उस शहर को तस्वीरों और बुजुर्गों की यादों में ही जानती है। यही किसी विस्थापन की सबसे बड़ी त्रासदी है—इंसान सिर्फ जमीन नहीं खोता, वह अपनी पहचान और इतिहास का एक हिस्सा भी खो देता है।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि 65 साल बाद भी पुनर्वास का मुद्दा क्यों कायम है? यदि किसी परियोजना के लिए हजारों लोगों से उनकी जमीन और घर लिए गए थे, तो पुनर्वास को तत्कालीन प्रक्रिया का अंतिम अध्याय माना जाना चाहिए था। लेकिन प्लाट, मालिकाना हक और पुनर्वास जैसी समस्याओं का दशकों तक बने रहना यह बताता है कि कहीं न कहीं व्यवस्था विस्थापितों की जरूरतों को प्राथमिकता देने में विफल रही।
पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने बड़े बांधों को आधुनिक भारत के मंदिरों की संज्ञा दी थी। ऐसे मंदिरों का निर्माण तभी सार्थक माना जा सकता है, जब उनकी नींव में अपना सब कुछ खोने वाले लोगों को न्याय भी मिले। विकास और विस्थापन के बीच संतुलन सिर्फ सरकारी फाइलों में नहीं, बल्कि प्रभावित परिवारों के जीवन में दिखाई देना चाहिए।
आज राज्य सरकार द्वारा निजी भूमि खरीदकर विस्थापितों को प्लाट देने के प्रस्ताव से उम्मीद जरूर जगी है। लेकिन अब जरूरत केवल घोषणा की नहीं, बल्कि समयबद्ध और पारदर्शी क्रियान्वयन की है। बार-बार योजनाएं बनना और उनका ठंडे बस्ते में चले जाना विस्थापितों के विश्वास को और कमजोर करता है।
सरकार को चाहिए कि वह भाखड़ा विस्थापितों की समस्या को सामान्य प्रशासनिक मामला न मानकर ऐतिहासिक जिम्मेदारी के रूप में देखे। पात्र विस्थापितों की स्पष्ट सूची, भूमि की उपलब्धता, प्लाट आवंटन, मालिकाना हक और पूरी प्रक्रिया की समयसीमा सार्वजनिक की जानी चाहिए। साथ ही पुराने बिलासपुर की संस्कृति और इतिहास को संरक्षित करने के लिए एक ऐसा स्मृति केंद्र या संग्रहालय विकसित किया जा सकता है, जहां आने वाली पीढ़ियां उस शहर की कहानी जान सकें जो विकास की धारा में डूब गया।
65 साल बाद बिलासपुर के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पुराना शहर क्यों डूबा। असली सवाल यह है कि जिस विकास ने देश को रोशन किया, क्या उसकी रोशनी उन परिवारों तक भी पहुंची जिन्होंने अपनी जमीन और विरासत खोई थी?
भाखड़ा बांध भारत के विकास की गौरवगाथा है, लेकिन बिलासपुर के विस्थापित उस गौरवगाथा का वह अध्याय हैं जिसे भुलाया नहीं जा सकता। अब समय है कि इतिहास को सिर्फ याद न किया जाए, बल्कि उससे न्याय का रास्ता निकाला जाए।
65 साल का इंतजार बहुत लंबा होता है। अब विस्थापितों को आश्वासन नहीं, अपने अधिकार का ठोस समाधान चाहिए।






