संसद में हंगामे पर शांता कुमार का बड़ा बयान, बोले- 'काम नहीं तो वेतन नहीं' का नियम हो लागू
शिमला। पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री शांता कुमार ने संसद में लगातार बढ़ते हंगामे और घटती सार्थक चर्चाओं पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था संसद में अब बहस और जनहित के मुद्दों पर चर्चा कम होती जा रही है, जबकि हंगामा और नारेबाजी ज्यादा देखने को मिल रही है।
शांता कुमार ने मांग की है कि संसद में "काम नहीं तो वेतन नहीं" का सिद्धांत लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कई बार पूरा सत्र बिना किसी महत्वपूर्ण चर्चा के समाप्त हो जाता है और कई जरूरी विधेयक भी पर्याप्त बहस के बिना पारित कर दिए जाते हैं।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र देश के स्वतंत्रता सेनानियों और देशभक्तों के लंबे संघर्ष और बलिदान से हासिल हुआ है, लेकिन आज संसद में जिस तरह से कामकाज प्रभावित हो रहा है, उससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होती दिखाई दे रही है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि संसद चलाने में जनता के करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। ऐसे में यदि सदन में लगातार व्यवधान के कारण कामकाज ठप रहता है और केवल शोर-शराबा होता है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि जिन सांसदों के कारण सदन की कार्यवाही बाधित होती है, उन्हें उस अवधि का वेतन और भत्ते नहीं दिए जाने चाहिए।
शांता कुमार ने तंज कसते हुए कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद आज कुछ खास मौकों पर ही पूरी तरह शांत नजर आती है। पहला, जब किसी बड़े नेता के निधन पर शोक प्रस्ताव होता है और दूसरा, जब सांसदों के वेतन एवं भत्तों में बढ़ोतरी से जुड़ा मामला सदन में आता है। इसके अलावा कई बार संसद "शोर सभा" बनकर रह जाती है।
उन्होंने सभी राजनीतिक दलों और नेताओं से अपील की कि वे लोकतंत्र की गरिमा बनाए रखने के लिए गंभीरता से प्रयास करें। उन्होंने कहा कि संसद केवल विरोध और हंगामे का मंच नहीं, बल्कि देश की जनता के मुद्दों पर गंभीर चर्चा और समाधान का स्थान होना चाहिए।






