पर्यावरण संरक्षण में हिमाचल बनेगा मॉडल, हमीरपुर में बनेगा देश का पहला बायोचार प्लांट
शिमला/हमीरपुर। हिमाचल प्रदेश अपनी समृद्ध वन संपदा के दम पर न केवल उत्तर भारत को स्वच्छ हवा प्रदान कर रहा है, बल्कि अब पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के क्षेत्र में भी देश के लिए नई मिसाल बनने जा रहा है। राज्य के हमीरपुर जिले के नेरी में देश का पहला स्वदेशी बायोचार संयंत्र विकसित किया जा रहा है। मंगलवार को मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना की प्रगति की समीक्षा करते हुए इसे पर्यावरण संरक्षण और हरित अर्थव्यवस्था की दिशा में एक बड़ा कदम बताया।
प्रदेश सरकार ने अगस्त 2025 में हमीरपुर के नेरी और जाहू में दो बायोचार संयंत्र स्थापित करने की पहल की थी। इसके लिए डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, वन विभाग और चेन्नई की प्रोक्लाइम सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के बीच त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसी समझौते के तहत अब यह परियोजना धरातल पर उतर रही है।
2.50 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदा जाएगा बायोमास
मुख्यमंत्री ने बताया कि इस परियोजना के लिए जंगलों और अन्य स्थानों से एकत्र किए जाने वाले बायोमास की खरीद 2 रुपये 50 पैसे प्रति किलोग्राम की दर से की जाएगी। यदि बायोमास की गुणवत्ता बेहतर पाई जाती है तो प्रदर्शन के आधार पर अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि भी प्रदान की जाएगी।
उन्होंने कहा कि परियोजना के तहत चीड़ की सूखी पत्तियां, लैंटाना, बांस और अन्य वनस्पतियों से प्राप्त बायोमास का उपयोग कर बायोचार तैयार किया जाएगा। अनुमान है कि अगले दस वर्षों में इस परियोजना से करीब 28,800 कार्बन क्रेडिट प्राप्त होंगे, जिससे हिमाचल प्रदेश की हरित पहलों को नई गति मिलेगी और राज्य की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
13.5 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन प्रबंधन का लक्ष्य
मुख्यमंत्री सुक्खू ने बताया कि हिम एवरग्रीन इंटीग्रेटेड क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर एंड एग्रो-फॉरेस्ट्री कार्यक्रम के तहत प्रदेश के 50 हजार हेक्टेयर पात्र कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और कृषि वानिकी को बढ़ावा दिया जाएगा।
इस कार्यक्रम के माध्यम से लगभग 13.5 मिलियन टन (1.35 करोड़ टन) कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के प्रबंधन में योगदान मिलने का अनुमान है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होगा, जैव विविधता का संरक्षण होगा, खेती जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनेगी और कार्बन अवशोषण क्षमता में वृद्धि होगी।
पूरे कार्यक्रम की निगरानी के लिए जीआईएस, रिमोट सेंसिंग और डिजिटल डेटा संग्रह जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जाएगा, ताकि अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाजार के मानकों का भी पूरी तरह पालन सुनिश्चित किया जा सके।
जलवायु संकट से निपटने में बनेगा मॉडल
बैठक में प्रोक्लाइम के सलाहकार मंडल के सदस्य और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के पूर्व कार्यकारी निदेशक एरिक सोलहाइम भी उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि उनकी संस्था वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जमीनी स्तर पर प्रभावी कार्य के माध्यम से जलवायु संकट से निपटने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कार्बन उत्सर्जन कम करने और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में हिमाचल सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना भी की।
बैठक में पर्यावरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव सुशील कुमार सिंगला और प्रोक्लाइम के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी केविन कुमार कंदासेमी भी मौजूद रहे।






