कब करें टमाटर, कद्दू और खीरा की बुवाई? जानें सही समय और मिट्टी में कितनी खाद मिलाना है जरूरी
पहाड़ी राज्यों में मौसम का हर छोटा-बड़ा बदलाव खेती की दिशा तय करता है। ऐसे में परंपरागत अनुभव के साथ वैज्ञानिक सलाह अपनाना किसानों के लिए सबसे बड़ा सहारा बन जाता है। अप्रैल का दूसरा पखवाड़ा फसलों की बढ़वार, पोषण प्रबंधन और रोग नियंत्रण के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय ने किसानों के लिए विस्तृत एडवाइजरी जारी की है।
निदेशालय ने किसानों से अपील की है कि वे इस एडवाइजरी के अनुसार ही कृषि कार्य करें। सही समय पर उर्वरकों का प्रयोग, संतुलित सिंचाई और उचित दवाइयों के इस्तेमाल से न केवल फसल की गुणवत्ता बेहतर होगी, बल्कि उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
निचले पर्वतीय क्षेत्रों में जहां टमाटर, बैंगन, मिर्च और कद्दू वर्गीय फसलों की रोपाई पहले ही हो चुकी है, वहां अब नाइट्रोजन की पहली खुराक देने का समय है। किसानों को सलाह दी गई है कि निराई-गुड़ाई के बाद 50 से 75 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर की दर से डालें।
मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में इन दिनों टमाटर, बैंगन, शिमला मिर्च और मिर्च जैसी ग्रीष्मकालीन सब्जियों की रोपाई का सही समय है। साथ ही खीरा, करेला, कद्दू और घिया जैसी फसलों की बिजाई भी की जा सकती है। रोपाई से पहले खेतों की अच्छी तरह जुताई कर 200 क्विंटल गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर मिलाना जरूरी है। संतुलित उर्वरक प्रबंधन के तहत इफको (12:32:16), म्यूरेट ऑफ पोटाश और यूरिया का उचित मात्रा में प्रयोग करने की सलाह दी गई है।
कद्दू वर्गीय फसलों के लिए दूरी का विशेष ध्यान रखने को कहा गया है। पंक्तियों के बीच 125 से 150 सेंटीमीटर और पौधों के बीच 75 से 90 सेंटीमीटर की दूरी रखने से पौधों को पर्याप्त पोषण और जगह मिलती है।
इस समय भिंडी और फ्रासबीन की बिजाई भी उपयुक्त मानी गई है। उन्नत किस्मों के चयन के साथ गोबर की खाद और रासायनिक उर्वरकों का संतुलित प्रयोग बेहतर उत्पादन में सहायक होगा।
खरपतवार नियंत्रण के लिए दो चरणों में निराई-गुड़ाई करने की सलाह दी गई है। पहली निराई रोपाई के 2–3 सप्ताह बाद और दूसरी करीब एक महीने बाद करें। रासायनिक नियंत्रण के लिए एलाक्लोर या पैण्डीमिथेलिन का छिड़काव भी प्रभावी माना गया है, बशर्ते मिट्टी में नमी बनी रहे।
ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में मटर, मूली, गाजर, शलजम और पालक जैसी फसलों की बिजाई का यह सही समय है। इसके अलावा फूलगोभी, बंदगोभी, ब्रोकली और अन्य सब्जियों की पौध भी खेतों में रोपी जा सकती है।
फलदार पौधों जैसे आम, केला, पपीता, अंगूर, नींबू और अनार के बागों में इस समय नियमित सिंचाई बेहद जरूरी है। बढ़ते तापमान के बीच मिट्टी में नमी बनाए रखना फलधारण और पौधों की वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है।
फसल संरक्षण के लिए रोग और कीट नियंत्रण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। सब्जियों की नर्सरी में कमरतोड़ रोग से बचाव के लिए क्यारियों का उपचार करना जरूरी है। वहीं कद्दू वर्गीय फसलों में लाल बीटल और टमाटर-आलू में झुलसा रोग के नियंत्रण के लिए समय-समय पर उचित दवाइयों का छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
कुल मिलाकर, यह समय किसानों के लिए बेहद संवेदनशील है, जहां थोड़ी सी सावधानी और वैज्ञानिक तरीके अपनाकर वे अपनी फसल को बेहतर उत्पादन और गुणवत्ता की ओर ले जा सकते हैं।












