हाईकोर्ट के सामने पेश हुए मुख्य सचिव, अदालतों के इंफ्रास्ट्रक्चर पर मांगा जवाब
शिमला: हिमाचल प्रदेश की अदालतों में बुनियादी सुविधाओं और ढांचे के विकास को लेकर चल रहे स्वत: संज्ञान मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। मामले की सुनवाई के दौरान राज्य के मुख्य सचिव संजय गुप्ता को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होना पड़ा।
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ कर रही है। इससे पहले अदालत ने अदालतों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में हो रही देरी और सरकार की उदासीनता पर नाराजगी जताते हुए मुख्य सचिव को इन-पर्सन कोर्ट में पेश होने के आदेश दिए थे।
मुख्य सचिव ने कोर्ट को दिया भरोसा
मुख्य सचिव संजय गुप्ता निर्धारित समय पर हाईकोर्ट पहुंचे और अदालत के समक्ष सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि आने वाले दिनों में राज्य मंत्रिमंडल की बैठक प्रस्तावित है, जिसमें अदालतों के बुनियादी ढांचे से जुड़े मुद्दे को प्रमुखता से रखा जाएगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार इस विषय पर सर्वोच्च स्तर पर सकारात्मक निर्णय लेगी।
सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता ने भी अदालत को आश्वस्त किया कि वह स्वयं इस मामले को कैबिनेट के समक्ष रखेंगे, ताकि अदालतों में लंबित आधारभूत सुविधाओं के विकास कार्यों को गति मिल सके।
हाईकोर्ट ने मांगा नया एफिडेविट
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को मामले में नया एफिडेविट दायर करने के निर्देश दिए हैं। अदालत अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 18 जून को करेगी। माना जा रहा है कि अगली सुनवाई में सरकार को अदालतों के बुनियादी ढांचे के विकास को लेकर ठोस कार्ययोजना पेश करनी पड़ सकती है।
सरकार की बेरुखी पर पहले भी लगा चुका है जुर्माना
गौरतलब है कि हिमाचल हाईकोर्ट लंबे समय से प्रदेश की अदालतों में बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने की मांग करता रहा है। अदालत ने कई बार राज्य सरकार को आवश्यक बजट और संसाधन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे, लेकिन सरकार की ओर से अपेक्षित कदम नहीं उठाए गए।
राज्य सरकार द्वारा अदालत के आग्रह को लगातार नजरअंदाज किए जाने पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए सरकार पर 10 लाख रुपये की कॉस्ट भी लगाई थी। इसके अलावा वित्त विभाग के अधिकारियों को भी कई सख्त निर्देश जारी किए गए थे।
हाईकोर्ट के इस रुख को न्यायिक व्यवस्था में सुधार और अदालतों की आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।






