आखरी सांस तक चीन से लोहा लेते रहे थे भारतीय बहादुर सैनिक
. 22 व 23 अक्टूबर 1962 को चीन ने लद्दाख व नेफा की चौकियों पर किया था भीषण आक्रमण
. ड्रैगन ने 43000 वर्ग किलोमीटर भारतीय जमीन कब्जा कर ली थी
भारत चीन युद्ध की शुरुआत वर्ष 1962 में 21 अक्टूबर को हुई थी और इस युद्ध में चीन ने भारत के बहुत बड़े इलाकों को हथिया लिया था। पूर्व सैनिक संयुक्त मोर्चा (जेसीओ एवं ओआर) हिमाचल प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष कै. जगदीश वर्मा ने इस संवाददाता के साथ युद्ध की 63वीं वर्षगांठ के अवसर पर 1962 भारत चीन युद्ध के संस्मरणों को साझा करते हुए कहा कि चीन भारत युद्ध की शुरुआत 21 अक्टूबर 1962 को सुबह 5:15 बजे हुई थी तथा 22 व 23 अक्टूबर को चीन ने भारत की लद्दाख व नेफा की चौकियों पर भीषण आक्रमण कर दिया था। 21 नवंबर 1963 तक लगभग 11 महीनों तक चले इस युद्ध में भारतवर्ष के 3000 से भी अधिक सैनिक शहीद हो गए थे तथा 43000 वर्ग किलोमीटर जमीन से भी भारत को हाथ धोना पड़ा था। भारतीय सेना ने फिर अपने अदम्य साहस व जज्बे से चीन की बड़ी सेना का मुकाबला किया था। भारत ने उस समय भारतीय वायु सेना की भी मदद लेने में संकोच किया था। चीन के लगभग 3500 सैनिकों के मुकाबले भारत के 124 सैनिकों ने लोहा लिया और आखिरी दम तक लड़ते हुए शहीद हो गए। इस युद्ध के समय केंद्र सरकार का नेतृत्व कांग्रेस पार्टी के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के हाथ में था जो चीन पर अत्यधिक विश्वास करते थे और भारत में यह संदेश दिया जाता था कि चीन भारत पर कभी भी आक्रमण नहीं कर सकता है। इसी भरोसे सेना की तैयारी नहीं की गई थी और सड़कों की कमी, संपर्क तथा आने जाने के साधन नाम मात्र होना, खाद्य सामग्री व गोला बारूद का सैनिकों तक न पहुंचना भारत की हार का कारण बना जिसके लिए भारत की सेना नहीं बल्कि केंद्र सरकार पूर्ण रूप से जिम्मेदार मानी गई है। अरुणाचल प्रदेश के तवाग क्षेत्र में रूपा, बोमडिला आदि चौकियों पर निहत्थे भारतीय सैनिकों ने आमने-सामने की लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने काफी समय तक चीनी सैनिकों को रोक कर रखा था। वायुसेना की सहायता न मिलने पर तथा पीछे से कोई भी सहायता न मिलने के कारण सैनिक चौकियों को छोड़ने पर मजबूर हो गए थे। जिसमें हमारे कई सैनिक शहीद हो गए थे।
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क्यों शुरू हुआ युद्ध
कैप्टन जगदीश वर्मा ने बताया कि इस युद्ध के शुरू होने के दो मुख्य कारण रहे थे। 1954 में भारत ने पंचशील के सिद्धांत व चीन से अच्छे संबंध बनाने के लिए चीन के शासक चोव एन लाई को स्वतंत्र देश तिब्बत को चीन का हिस्सा मानने पर सहमति दे दी थी। इसके बाद 1959 में दलाई लामा का भारत में भूतपूर्व स्वागत तथा भारत में शरण देना पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चीन को अच्छा नहीं लगा। चीन ने 1954 में हुए समझौता तथा "हिंदी चीनी भाई-भाई" के स्लोगन को भी तोड़ने की तरफ पहला कदम उठाकर भारत पर आरोप लगाया कि तिब्बत के टकराव के लिए भारत पूर्ण रूप से जिम्मेदार है। दूसरी तरफ चीन ने 1957 में अक्साई चिन् पर जबरदस्ती कब्जा करके भारत को नाराज कर दिया, क्योंकि वह भारत का हिस्सा था वह हिस्सा आज भी चीन के जिन-जियाग प्रांत से जुड़ा है तथा चीन ने वहां सड़क का निर्माण करके अपने प्रांत से जोड़ लिया है जबकि भारत इसका विरोध करता आ रहा है। लेकिन चीन इसकी अनदेखी करता आ रहा है। भारत को चीन से इस क्षेत्र को वापस लेने को महत्व देना चाहिए।
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शहीद हुए सैनिकों को नमन
आज भी चीन लद्दाख व गलवान घाटी अरुणाचल प्रदेश में तवांग तथा अन्य स्थानों पर आए दिन एल ए सी पर अपना दावा करता रहता हैं जिसे उसने युद्ध उपरांत छोड़ दिया था तथा भारत चीन बॉर्डर पर तनाव की स्थिति पैदा कर देता है, लेकिन पिछले वर्षों गलवान व अन्य क्षेत्रो में हुई सैनिकों की झड़प ने चीन को दिखा दिया है कि आज का भारत 1962 के भारत से काफी भिन्न है व जवाब देने में सक्षम है। ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान भारतवर्ष की सहस्त्र सेनाओं का पराक्रम तो पूरे संसार में आज देख लिया है। आज 1962 भारत चीन के साथ हुए युद्ध की वर्षगांठ पर हम उन शहीदों को नमन करते हैं जिन्होंने इस युद्ध में अपने प्राण देश के लिए बलिदान कर दिए थे।
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भारत ने समय रहते उचित कदम उठाए होते तो नहीं होती हार
चीन ने अपने सैनिकों की संख्या में भारी वृद्धि, हथियार व गोला बारूद काफी मात्रा में जमा कर लिया था लेकिन दूसरी तरफ भारत में उस समय के प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री व सेना अध्यक्ष इस बात से अनभिज्ञ थे कि चीन युद्ध करने की तैयारी कर रहा है। इस इलाके में भारत के कम सैनिकों के होने व किसी भी प्रकार की तैयारी न होने व सारा क्षेत्र पहाड़ी होने व आने जाने की सुविधा से वंचित पीछे के कमांडरों से संपर्क न होने के कारण असफलता की ओर बढ़ते रहे और हमारे सैनिक सिर्फ अपने दम पर ही लड़ते रहे अगर केंद्र सरकार की तरफ से उचित कदम उठाए होते तो भारत की सेना को इस युद्ध की हार से बचा जा सकता था। हार किसी भी प्रकार से सैनिकों की तरफ से नहीं हुई बल्कि इसके लिए पूर्ण रूप से सरकार ही हार का कारण बनी थी।












