नगर निगमों में मेयर पद को लेकर बढ़ी हलचल, सरकार ने अभी जारी नहीं किया रोस्टर
शिमला। हिमाचल प्रदेश के चारों नगर निगमों के चुनाव परिणाम घोषित हो चुके हैं और 63 वार्डों में नए पार्षद चुन लिए गए हैं। चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब राजनीतिक दलों, निर्वाचित पार्षदों और संभावित दावेदारों की निगाहें महापौर (मेयर) पद के आरक्षण रोस्टर पर टिक गई हैं। हालांकि चुनाव परिणाम सामने आने के बावजूद राज्य सरकार की ओर से अभी तक मेयर पद का आरक्षण रोस्टर जारी नहीं किया गया है, जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं और अटकलों का दौर तेज हो गया है।
नगर निगमों में मेयर का पद स्थानीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित पद माना जाता है। यही वजह है कि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह बन गया है कि चारों नगर निगमों में मेयर की कुर्सी किस श्रेणी के लिए आरक्षित होगी। रोस्टर जारी न होने के कारण संभावित दावेदार अपनी दावेदारी को लेकर स्पष्ट रणनीति नहीं बना पा रहे हैं, वहीं राजनीतिक दलों के भीतर भी नेतृत्व को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
मेयर पद का आरक्षण रोस्टर नगर निगम की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है। रोस्टर के आधार पर ही यह तय होता है कि सामान्य, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग अथवा महिला वर्ग में से किस श्रेणी के पार्षद मेयर पद की दौड़ में शामिल हो सकेंगे। ऐसे में रोस्टर जारी होने के बाद ही वास्तविक राजनीतिक तस्वीर सामने आएगी और विभिन्न दलों के भीतर मेयर पद को लेकर मंथन तेज होगा।
चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के समय भी मेयर पद के आरक्षण को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी। उस दौरान भी राजनीतिक दलों और संभावित उम्मीदवारों ने सरकार से जल्द रोस्टर जारी करने की मांग उठाई थी। अब जबकि चुनाव परिणाम भी आ चुके हैं, तब भी रोस्टर का इंतजार जारी है। इससे निर्वाचित पार्षदों के बीच भी मेयर पद को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
इस बार मेयर पद का महत्व पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गया है। प्रदेश सरकार ने हाल ही में नगर निगम महापौर का कार्यकाल ढाई वर्ष से बढ़ाकर पांच वर्ष कर दिया है। पहले ढाई वर्ष के कार्यकाल के कारण नेतृत्व परिवर्तन की संभावना बनी रहती थी, लेकिन अब एक बार चुना गया महापौर पूरे पांच वर्ष तक नगर निगम का नेतृत्व करेगा। ऐसे में मेयर पद न केवल राजनीतिक दृष्टि से बल्कि प्रशासनिक और विकासात्मक दृष्टि से भी अधिक प्रभावशाली हो गया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि रोस्टर जारी होने के बाद नगर निगमों में सत्ता संतुलन और नेतृत्व की तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाएगी। कई नगर निगमों में ऐसे पार्षद भी चुने गए हैं जो मेयर पद के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं, लेकिन आरक्षण की स्थिति स्पष्ट न होने के कारण वे खुलकर सामने नहीं आ पा रहे हैं।
उधर, शहरी विकास विभाग के अनुसार मेयर पद के आरक्षण रोस्टर से संबंधित प्रक्रिया अंतिम चरण में है। विभाग की ओर से प्रस्ताव तैयार कर विधि विभाग को भेजा जा चुका है और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद रोस्टर जारी किया जाएगा। ऐसे में अब सभी की निगाहें राज्य सरकार के अगले फैसले पर टिकी हैं, क्योंकि रोस्टर जारी होते ही चारों नगर निगमों में मेयर पद की राजनीतिक सरगर्मियां और तेज होने की संभावना है।






