CSR फंड में लापरवाही पर हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार को फटकार; कंपनियों पर कार्रवाई के आदेश
शिमला। हिमाचल प्रदेश में आपदा राहत को लेकर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने बड़ी कंपनियों द्वारा कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत औसत लाभ का 2 प्रतिशत खर्च न करने पर नाराज़गी जताते हुए राज्य सरकार को फटकार लगाई है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि वर्ष 2023 और 2025 में आई भीषण आपदाओं के बावजूद न तो कोई सबक लिया गया और न ही उच्च स्तर पर ठोस कार्रवाई हुई। अदालत ने कहा कि CSR फंड के उपयोग को लेकर स्थिति बेहद निराशाजनक है।
सुनवाई के दौरान उद्योग विभाग के विशेष सचिव द्वारा दाखिल शपथपत्र पर भी कोर्ट ने असंतोष जताया। इसमें बताया गया था कि कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 135(7) के तहत जुर्माना लगाने की प्रक्रिया कॉर्पोरेट मामलों का मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आती है और इस संबंध में फरवरी 2026 में मंत्रालय से संपर्क किया गया है।
हाईकोर्ट ने पाया कि उद्योग विभाग अब भी कंपनियों से डेटा जुटाने और आपदा प्रबंधन में उनके योगदान की प्रक्रिया में ही उलझा हुआ है। इस पर अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिए कि NTPC Limited सहित अन्य कंपनियों के अप्रयुक्त CSR फंड की स्थिति स्पष्ट की जाए।
इसके साथ ही राज्य के मुख्य सचिव को हलफनामा दाखिल करने के आदेश दिए गए हैं, जिसमें आपदा के बाद पुनर्वास कार्यों में CSR भागीदारी से जुड़े सभी दिशा-निर्देशों और परिपत्रों का पूरा ब्यौरा हो। अदालत ने यह भी पूछा है कि क्या राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने जिला स्तर पर आपदा से जुड़े बुनियादी ढांचे का कोई आकलन तैयार किया है।
कोर्ट ने साफ निर्देश दिए हैं कि CSR फंड के तहत पेयजल योजनाओं, अस्पतालों और स्कूलों जैसी परियोजनाओं का विस्तृत विवरण अगली सुनवाई से पहले प्रस्तुत किया जाए। साथ ही चेतावनी दी है कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत दोषी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू न होने पर केंद्र और राज्य सरकार—दोनों पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।
यह मामला अब राज्य में CSR फंड के उपयोग और आपदा प्रबंधन की जवाबदेही को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।












