‘कमाऊ पूत’ पर किसका हक? शानन प्रोजेक्ट को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
आर्थिक तंगी से जूझ रहे हिमाचल प्रदेश के लिए आज, 27 अप्रैल, बेहद निर्णायक दिन साबित हो सकता है। मंडी जिले के जोगिंद्रनगर स्थित ऐतिहासिक शानन जलविद्युत परियोजना को लेकर पंजाब और हिमाचल के बीच चल रहे विवाद पर आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होनी है। यह वही परियोजना है, जिससे सालाना करीब 200 करोड़ रुपये की आय होती है और जिसे हिमाचल की आर्थिक सेहत के लिए “कमाऊ पूत” माना जाता है।
दरअसल, इस परियोजना की स्थापना ब्रिटिश काल में हुई थी। 3 मार्च 1925 को तत्कालीन अंग्रेज हुकूमत और मंडी रियासत के राजा जोगेंद्र सेन के बीच लीज एग्रीमेंट हुआ था, जिसकी अवधि 2 मार्च 2024 को समाप्त हो चुकी है। समझौते के मुताबिक, लीज खत्म होने के बाद परियोजना का स्वामित्व उस क्षेत्र की सरकार को मिलना था, जहां यह स्थित है—यानी हिमाचल प्रदेश को।
लेकिन लीज समाप्त होने के बावजूद पंजाब सरकार ने परियोजना का नियंत्रण नहीं छोड़ा। हिमाचल सरकार ने कई बार बातचीत और पत्राचार के माध्यम से इसे सौंपने का आग्रह किया, यहां तक कि “बड़े भाई” होने का हवाला भी दिया, लेकिन बात नहीं बनी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पंजाब सरकार ने 25 फरवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की कि हिमाचल को इस परियोजना का अधिग्रहण करने से रोका जाए। पंजाब का तर्क है कि 1966 के पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के तहत यह परियोजना उसके नियंत्रण में है। हालांकि, इस अधिनियम में यह भी स्पष्ट है कि बिजलीघर का प्रबंधन ही पंजाब को सौंपा गया था, स्वामित्व नहीं।
इतिहास पर नजर डालें तो आजादी के समय हिमाचल, पंजाब का ही हिस्सा था। 15 अप्रैल 1948 को हिमाचल का गठन हुआ और 25 जनवरी 1971 को इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। ऐसे में हिमाचल सरकार का दावा है कि लीज समाप्त होने के बाद परियोजना पर उसका हक बनता है।
मामले में केंद्र सरकार भी पक्षकार है। केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि केंद्र इस मुद्दे पर निष्पक्ष रुख अपनाएगा। वहीं, मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री लगातार कह रहे हैं कि पंजाब को नैतिक जिम्मेदारी निभाते हुए यह परियोजना हिमाचल को सौंप देनी चाहिए।
इस बीच, हिमाचल को भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) परियोजनाओं से जुड़े करीब 4000 करोड़ रुपये के एरियर भी अब तक नहीं मिले हैं, जो राज्य की वित्तीय स्थिति को और कमजोर कर रहे हैं। चंडीगढ़ में भी हिमाचल की हिस्सेदारी का मुद्दा लंबे समय से लंबित है।
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं। अगर फैसला हिमाचल के पक्ष में आता है, तो न केवल राज्य को एक बड़ा आर्थिक सहारा मिलेगा, बल्कि वर्षों से चले आ रहे इस विवाद का भी अंत हो सकता है।












