30 साल बाद फिर गूंजेगी स्टीम इंजन की सीटी, कांगड़ा घाटी में लौटेगा रेल इतिहास का सुनहरा दौर
कांगड़ा। एक दौर था जब स्टीम इंजन की सीटी और कोयले के धुएं से आसमान गूंज उठता था। लेकिन 1990 के दशक के बाद भारतीय रेलवे ने धीरे-धीरे स्टीम इंजनों को सेवा से हटा दिया और ये इंजन इतिहास के पन्नों और संग्रहालयों तक सिमट कर रह गए। अब करीब तीन दशक बाद एक बार फिर स्टीम इंजन की वापसी होने जा रही है।
पर्यटन को बढ़ावा देने और रेलवे की ऐतिहासिक विरासत को संजोने के लिए भारतीय रेलवे जल्द ही पंजाब के पठानकोट से हिमाचल प्रदेश के जोगिंदरनगर तक चलने वाले नैरोगेज ट्रैक पर स्टीम इंजन दौड़ाने की तैयारी कर रहा है। वर्ष 1952 में निर्मित इस ऐतिहासिक स्टीम इंजन को विशेष रूप से तैयार किया गया है और इसका सफल ट्रायल भी लिया जा चुका है।
रेलवे विभाग का मानना है कि इस पहल से न केवल देश-विदेश के पर्यटकों को एक अनोखा अनुभव मिलेगा, बल्कि नई पीढ़ी भी उस रेल इतिहास से रूबरू हो सकेगी जिसे उन्होंने केवल किताबों और फिल्मों में देखा है। इंजन को पूरी तरह संचालन योग्य बनाने के लिए हरियाणा के रेवाड़ी से विशेषज्ञ इंजीनियरों की टीम भी पहुंचेगी।
पठानकोट रेलवे इंजन शेड में पहुंचे इस ऐतिहासिक स्टीम इंजन ने रेलवे कर्मचारियों और रेल प्रेमियों के बीच उत्साह का माहौल बना दिया है। रेलवे कर्मचारियों का कहना है कि यह इंजन उनके कार्यकाल से भी पहले का है और उन्होंने इसे केवल तस्वीरों में ही देखा था।
उनका कहना है कि स्टीम इंजन के संचालन से पंजाब और हिमाचल के बीच रेल यात्रा को एक नया ऐतिहासिक आयाम मिलेगा। कांगड़ा घाटी की खूबसूरत वादियों से गुजरती यह ट्रेन पर्यटकों के लिए आकर्षण का बड़ा केंद्र बनेगी। धुएं के गुबार और सीटी की आवाज के साथ दौड़ता यह इंजन लोगों को पुराने दौर की यादें ताजा कराएगा।
रेलवे विभाग को उम्मीद है कि स्टीम इंजन की वापसी से कांगड़ा घाटी रेलवे को नई पहचान मिलेगी और पर्यटन गतिविधियों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। जल्द ही पर्यटक पंजाब से हिमाचल तक इस ऐतिहासिक स्टीम इंजन की सवारी का रोमांच महसूस कर सकेंगे।






