जिंदा महिला को ‘मृत’ बताकर बंद की पेंशन, बिलासपुर में सिस्टम का बड़ा गड़बड़झाला
9 साल से बीमार महिला रिकॉर्ड में ‘मर गई’, परिवार दर-दर भटकने को मजबूर
बिलासपुर। हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले से सरकारी तंत्र की गंभीर लापरवाही का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। नैना देवी विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत कचौली में एक जीवित महिला को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया गया, जिसके चलते उसकी सहारा पेंशन अचानक बंद कर दी गई। इस घटना ने न केवल प्रभावित परिवार को झकझोर दिया है, बल्कि प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के अनुसार कचौली निवासी शीला देवी पिछले करीब नौ वर्षों से गंभीर बीमारी से जूझ रही हैं और बिस्तर पर हैं। उनका उपचार एम्स बिलासपुर में चल रहा है। परिवार पहले ही आर्थिक और मानसिक दबाव झेल रहा था, लेकिन हालात उस समय और बिगड़ गए जब उनके पति बलदेव शर्मा को पता चला कि सरकारी कागजों में उनकी पत्नी को “मृत” दर्ज कर दिया गया है।
बताया जा रहा है कि जब बलदेव शर्मा पेंशन संबंधी जानकारी लेने के लिए स्वास्थ्य विभाग के दफ्तर पहुंचे, तो उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि शीला देवी की मृत्यु दर्ज हो चुकी है और इसी आधार पर उनकी सहारा पेंशन योजना बंद कर दी गई है। हैरानी की बात यह है कि जिस महिला को रिकॉर्ड में मृत दिखाया गया, वह उसी समय अपने घर में जीवित अवस्था में उपचाराधीन थी।
परिवार का आरोप है कि उन्होंने फरवरी महीने में ही इस गंभीर गलती को लेकर संबंधित विभाग को लिखित शिकायत दी थी और मौके पर सत्यापन की मांग भी की थी, लेकिन दो महीने बीत जाने के बाद भी न तो कोई अधिकारी मौके पर पहुंचा और न ही रिकॉर्ड में सुधार किया गया। इससे साफ संकेत मिलता है कि प्रशासनिक लापरवाही के साथ-साथ शिकायत निस्तारण प्रणाली भी पूरी तरह सुस्त पड़ी है।
पीड़ित परिवार ने इस पूरे मामले को मानवाधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताते हुए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से सीधे हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि एक जीवित व्यक्ति को उसके अधिकारों से वंचित करने का मामला है। परिवार ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और तत्काल पेंशन बहाली की मांग की है।
वहीं, इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए सीएमओ बिलासपुर ने स्वीकार किया कि इस तरह की शिकायतें अन्य जगहों से भी सामने आ रही हैं। उन्होंने जांच के बाद उचित कार्रवाई का आश्वासन जरूर दिया है, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसी गंभीर चूक बार-बार क्यों हो रही है और आम जनता को अपने ही जीवित होने का प्रमाण देने के लिए क्यों भटकना पड़ रहा है।
यह मामला सिर्फ एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर बड़ा सवाल है जो आम आदमी के जीवन से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं तक को सही ढंग से संचालित नहीं कर पा रही। जब एक जीवित व्यक्ति को अपने ही अस्तित्व का प्रमाण देने के लिए दर-दर भटकना पड़े, तो यह सिस्टम की गंभीर विफलता को दर्शाता है। अब जरूरत है न केवल इस गलती को तुरंत सुधारने की, बल्कि ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई और जवाबदेही तय करने की ताकि किसी और को इस तरह की पीड़ा न झेलनी पड़े।












