विशाल पांडव शिला हथेली से हिलाओ और इस पर पत्थर-कंकड़ फेंको मन्नत पूरी होगी
सराज निर्वाचन क्षेत्र के थुनाग उपमंडल मुख्यालय से जंजैहली मार्ग पर स्थित धार-जरोल पंचायत के अंतर्गत मझाखल गांव (अब पाण्डव शिला गांव के नाम से प्रसिद्ध) में बाखली नदी के बाएं तट पर एक बहुत विशाल चट्टान पर दूसरी विशाल चट्टान इस प्रकार टिकी हुई है कि यदि इस ऊपर वाली चट्टान को श्रद्धालु और पर्यटक हथेली से हिलाते है तो यह चट्टान हिलने लगती है।इस शिला की स्थापना पांडव काल मे हुई थी। हिमाचल प्रदेश के स्थान नाम व्युत्पत्ति विवेचनात्मक अध्ययन पुस्तक मे लिखा है कि है कि पांडव काल में यह चट्टान यहा रास्ते पर पड़ी थी।भीम ने इसे रास्ते से हटा दिया।जो नीचे दूसरे बड़े पत्थर पर टिक गई।इस चट्टान को हथेली से हिलाने का प्रयास करे तो यह चट्टान हिलती है।चट्टान को हिलाने के बाद श्रद्धालु इस चट्टान के ऊपर छोटा सा पत्थर-कंकड़ फेंकते हैं।मान्यता है कि यदि फेंका गया पत्थर-कंकड़ इस हिलने वाली विशाल पाण्डव शिला के ऊपर टिक जाता है तो आस्था और विश्वास वाले श्रद्धालु की सुखपूर्वक और समृद्ध जीवन जीने की मनोकामना अवश्य पूरी होती है।दोनो शिलाओ के मध्य एक शिवलिंग भी स्थापित है। इस श्री विग्रह पर श्रद्धालुओं ने अपनी मन्नत पूरी होने पर लोहे के त्रिशूल अर्पित किए हैं। गांव के युवा नूतन प्रकाश "निशु" ने बताया कि यह शिला पांडवों के हुक्के की कटोरी का "चुगल"थी। लगभग चार-पांच वर्ष पूर्व तक इस शिला की गांव के स्व. राम नामक व्यक्ति निरंतर पूजा किया करते थे, लेकिन अब यहा पर कोई भी पुजारी नहीं है।एक अन्य मान्यता के आधार पर साहित्यकार, इतिहासकार और शिक्षाविद डॉक्टर हिमेंद्र बाली"हिम"का कहना है कि करसोग की भंथल पंचायत के रिक्की गांव की पूज्या नागणी जान के साथ भी इस पांडव शिला का संबंध है। डॉक्टर बाली का कहना है कि पांडव काल में करसोग के सनारली क्षेत्र में नरभक्षी यक्षिणी का आतंक था। इसकी एक बहन सराज क्षेत्र मे अपने आतंक के लिए कुख्यात थी।ये दोनो बहने इतनी शक्तिशाली थी कि ये दोनो शिकारी माता को चुनौती देने की सामर्थ्य रखती थी। जब पांडव लाक्षागृह की घटना के बाद इस क्षेत्र में आए तो भीम ने इन दोनो का वध कर दिया।वध करने के बाद दोनों में देवत्व की स्थापना की। तब से ये दोनो चट्टाने श्रद्धालुओं द्वारा अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए पूजी जाती हैं।












