तानाशाही के खिलाफ जनादेश देने के बावजूद नहीं बदले धर्मपुर के हालात, एसडीएम की कुर्सी पर बैठने को लेकर विधायक चंद्रशेखर हो रहे है जमकर ट्रोल
परिवारवाद और तानाशाही से परेशान होकर धर्मपुर की जनता ने जिस व्यक्ति पर विश्वास जताया था उसे तीन साल के कम समय में ही तानाशाही के पर लगने पर वोटर हैरान है। सियासी समंदर के भंवर में लगभग डूब चुके विधायक चंद्रशेखर की नैय्या पार लगाने वाली धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र को दूर दूर तक खबर नहीं थी कि जिस परिवारवाद और तानाशाही से मुक्त होने के लिए वोट डाले उससे उन्हें सही अर्थों में कभी मुक्ति नहीं मिलेगी। प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री हर्षवर्धन सिंह चौहान द्वारा पांवटा साहिब में एसडीएम की कुर्सी पर विराजमान होने से सुक्खू सरकार की किरकिरी होने के तुरंत बाद धर्मपुर के कांग्रेसी विधायक ने भी यही प्रथा दोहराते हुए एसडीएम की कुर्सी पर बैठ कर अधिकारियों की क्लास लेकर साबित कर दिया है कि न तो यह सरकार आम आदमी की सरकार है और न ही जनता के दिलों तक पहुंच पाई है। लकड़ी कांड करवा कर इस विधायक की सोच ने साबित कर दिया है कि वह जनता के लिए नहीं अपनी ऐशो आराम और पारिवारिक विकास के लिए राजनीति में आए हैं। धरमपुर के उपमंडलाधिकारी के कक्ष में कर्मचारियों की बैठक लेने पहुंचे विधायक एसडीएम धर्मपुर की कुर्सी पर विराजमान हो गए जबकि अतिरिक्त कार्यभार संभाले एसडीएम सरकाघाट को बगल में बैठना पड़ा। कांग्रेस पार्टी के लोग भले ही धर्मपुर के विधायक को लोकप्रिय करार देकर पार्टी अध्यक्ष बनाने की कोशिश में जुटे हों लेकिन हकीकत कुछ और ही है। यह माननीय तीन साल में ही अपनी लोकप्रियता का सूपड़ा साफ करवा चुके हैं। वादों की झड़ी लगाने वाले चंद्रशेखर अभी तक कुछ बड़ा नहीं करा पाए हैं जबकि आम जनता की मानें तो मंत्री पद का टेस्ट लेने वाले धर्मपुर को चारों तरफ अंधेरा ही नजर आता है। लोगों में चर्चा है कि दो चार प्रधानों को छोड़ कर किसी भी पंचायत प्रधान के काम नहीं हो पा रहे और विधायक ने बाकि प्रधानों को सरकार की नीतियों के साथ चलाने की कभी कोशिश ही नहीं की जो भविष्य में इनकी राजनीति के लिए आत्मघाती कदम समझा जा रहा है।
माकपा ने की कड़ी निंदा
माकपा नेता भूपेंद्र सिंह ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते कहा कि धर्मपुर के विधायक द्वारा एसडीएम की कुर्सी पर बैठक आयोजित करना नियमों के विपरीत हैं। कियूंकि किसी भी अधिकारी की कुर्सी पर बैठना अपने आप को उसकी मर्यादाओं का उलंघन है। जन प्रतिनिधि की भूमिका एक निश्चित समय अर्थात पांच साल के लिए होती है लेकिन कोई भी प्रशानिक अधिकारी एक प्रक्रिया के तहत चयनित होता है और उसके लिए हर प्रकार की सेवा शर्तें तय होती हैं और उसमें बैठने के लिए कुर्सी भी एक होती है।लेक़िन धर्मपुर के विधायक जो भी शायद अपना रौभ जताने के नजरिये से शायद ऐसा करने लगे हैं। हालांकि उनसे लोगों को जो उम्मीदें थीं उस पर तो वे खरा नहीं उतर पाये हैं और अब अधिकारियों की कुर्सी पर बैठ कर अपना रुतवा बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं जो सही नहीं है।विधायक का रुतवा जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतरने से ही बढ़ेगा न कि अधकारियों की कुर्सी पर बैठ कर और उन्हें रौभ झाड़ने से।
"मेरे पहुंचने से पहले बैठ चुके थे विधायक एसडीएम"
धर्मपुर का अतिरिक्त कार्यभार संभाले एसडीएम स्वाति डोगरा ने सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस फोटो को लेकर पहले तो इसे दबाने की भरपूर कोशिश की उन्होंने कहा कि यह फोटो मीटिंग का हाल का है और पैरेलल एक कुर्सी लगी हुई थी फिर जब उन्हें बताया गया की फोटो एसडीएम के ही कमरे का है पीछे बोर्ड भी साफ दिख रहा है यही नहीं इसकी वीडियो भी मौजूद है तो उन्होंने कहा कि इस बैठक में मेरे पहुंचने से पहले ही विधायक और तहसीलदार कमरे में पहुंच चुके थे और मीटिंग शुरू हो गई थी वह सरकाघाट से बाद में ऑफिस पहुंची है तब तक विधायक सीट पर बैठकर बैठक शुरू कर चुके थे।












