निर्जला एकादशी पर लडभड़ोल व जोगिंद्रनगर में लगी छबीलें, सेवा और आस्था से जुड़ा जनसरोकार
भीषण गर्मी और तपती दोपहर में जब राहगीर जल की एक बूंद को तरसते हैं, ऐसे समय में निर्जला एकादशी का पर्व समाज में सेवा, दान और आस्था का संदेश लेकर आता है। शुक्रवार को निर्जला एकादशी के अवसर पर जोगिंद्रनगर उपमंडल के लडभड़ोल व जोगिंद्रनगर क्षेत्रों में जगह-जगह मीठे पानी की छबीलें लगाई गईं। इन आयोजनों में युवाओं, सामाजिक संगठनों, दुकानदारों और आम जनता ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। लडभड़ोल बस स्टैंड के पास नागेश्वर युवक मंडल की ओर से विशेष छबील का आयोजन किया गया। मंडल के प्रधान चंदन हिमाचली और सचिव वरुण कांत शर्मा ने बताया कि जेठ माह की इस भीषण गर्मी में राहगीरों को राहत पहुंचाने के लिए यह सेवा की गई। स्टाल पर लोगों को मीठा ठंडा जल और शीतल पेय वितरित किया गया। उन्होंने बताया कि निर्जला एकादशी न केवल व्रत और उपवास का पर्व है, बल्कि सेवा और जलदान का भी विशेष महत्व रखता है। विशेषकर इस दिन जल से भरे घड़े, फल, पंखे आदि का दान करना बहुत पुण्यदायी माना जाता है। यह दिन धर्म, सेवा और परोपकार के आदर्श को मजबूत करता है।
इस आयोजन में युवक मंडल के सदस्य आदित्य भारद्वाज, आशीष भारद्वाज, प्रीतिश शर्मा, अनिकेत भारद्वाज, शिवम शर्मा, अनिमेष अवस्थी, अभिशार, ऋद्धि, निद्धी, मधु, जय, वीरू, संजीव शर्मा, अंचल शर्मा, विकास उपाध्याय, उदय, ईशान, अर्पित, विवेक भारद्वाज सहित बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए। इसी क्रम में ढंडोल युवक मंडल द्वारा चपलू पुल के पास भी छबील लगाई गई, जहां राहगीरों को मीठा जल व तरबूज बांटे गए। स्थानीय दुकानदारों और ग्रामीणों ने भी इन आयोजनों में उत्साहपूर्वक भाग लिया और सेवा कार्य में सहयोग किया। जोगिंद्रनगर नगर क्षेत्र में भी निर्जला एकादशी के अवसर पर धार्मिक भावना के साथ सेवा कार्य किए गए। मुख्य बाजार, बस स्टैंड, अस्पताल चौक और अन्य भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में सामाजिक संगठनों और स्थानीय युवाओं ने छबीलें लगाईं। राहगीरों को ठंडा पानी और तरबूज वितरित किए गए। दोपहर की भीषण गर्मी में इन छबीलों ने लोगों को राहत पहुंचाई और साथ ही सेवा भावना को भी प्रकट किया। इस दौरान बाजार क्षेत्र में व्यापारी वर्ग भी सक्रिय रूप से आयोजन में शामिल हुआ। दुकानदारों ने न केवल सामग्री उपलब्ध करवाई बल्कि स्वयं भी राहगीरों को पानी पिलाते दिखे। इन आयोजनों में स्कूली छात्रों, महिला मंडलों और स्थानीय युवाओं ने भी भाग लिया। हिंदू पंचांग के अनुसार, वर्ष भर में कुल 24 एकादशियाँ आती हैं, जिनमें निर्जला एकादशी सबसे अधिक कठिन और पुण्यकारी मानी जाती है। इस दिन व्रती को बिना जल ग्रहण किए उपवास करना होता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति इस दिन जल का त्याग कर व्रत रखता है, उसे वर्ष भर की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन विशेष रूप से जलदान, फलदान, पंखा या मटका दान करने की परंपरा है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भीमसेन ने महर्षि व्यास के कहने पर केवल इस एक एकादशी को निर्जल व्रत रखकर सभी एकादशियों का फल प्राप्त किया था, तभी से इसे ‘भीम एकादशी’ भी कहा जाता है। लडभड़ोल व जोगिंद्रनगर क्षेत्र में आयोजित इन छबीलों ने यह सिद्ध कर दिया कि जब धर्म और सेवा साथ चलें, तो समाज में सकारात्मक ऊर्जा स्वतः प्रवाहित होती है। युवाओं की भागीदारी, सामाजिक संगठनों का समर्पण और आम जनता की सहभागिता ने निर्जला एकादशी के इस पर्व को न केवल धार्मिक रूप से बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण बना दिया। इस पवित्र दिन पर हुए आयोजन न केवल एक परंपरा का निर्वहन थे, बल्कि उन्होंने मानवता, सेवा और भाईचारे की भावना को भी सशक्त किया।












