थप्पड़ मारो और सॉरी कहो, अब नहीं चलेगा, प्रदेश हाईकोर्ट ने आपराधिक अवमानना मामले में मांगी माफी ठुकराइ
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने धैर्य सुशांत और एक अन्य प्रतिवादी द्वारा दायर आपराधिक अवमानना मामले में मांगी गई माफी को अस्वीकार कर दिया है। न्यायालय ने कड़े शब्दों में कहा कि न्यायपालिका की बदनामी करने के बाद माफी बचाव का काम नहीं कर सकती। अवमानना का यह मामला सुशांत द्वारा सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए एक वीडियो से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने उच्च न्यायालय और एक मौजूदा न्यायाधीश पर गंभीर आरोप लगाए थे। इन टिप्पणियों को अदालत ने निंदनीय और अवमाननापूर्ण माना, क्योंकि इनमें न्यायिक पक्षपात और अपराधियों के साथ मिलीभगत के आरोप शामिल थे। माफी को अस्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति चौहान ने टिप्पणी की कि वे 'थप्पड़ मारो-माफी मांगो-और भूल जाओ' की विचारधारा को स्वीकार नहीं कर सकते। मामले को आरोप तय करने के लिए 16 जुलाई को सूचीबद्ध किया गया है।
स्वत: लिया संज्ञान
न्यायमूर्ति तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति सुशील कुकरेजा की खंडपीठ ने वीडियो का स्वत: संज्ञान लेते हुए इसे न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15 का उल्लंघन पाया। बार-बार स्पष्टीकरण देने के अवसर दिए जाने के बाद, 25 जून को 'बिना शर्त माफी' प्रस्तुत की गई, वह भी तब जब न्यायालय ने औपचारिक आरोप तय करने का संकेत दिया था। यह भी कहा कि प्रतिवादियों ने पहले कभी पश्चाताप व्यक्त नहीं किया। उनकी माफी वास्तविक पश्चाताप पर आधारित नहीं थी, बल्कि सजा से बचने की एक रणनीति थी।












