हिमाचल में सेब की प्राकृतिक बागवानी साबित हुई पारंपरिक से बेहतर: नौणी विवि का अध्ययन
हिमाचल प्रदेश में परंपरागत के बजाय सेब की प्राकृतिक बागवानी की तकनीक कई मायनों में बेहतर पाई गई है। परंपरागत बागवानी में रासायनिक कीटनाशकों, फफूंदनाशकों और उर्वरकों का छिड़काव किया जाता है, जबकि प्राकृतिक बागवानी में इनसे परहेज किया जाता है। डॉ. यशवंत सिंह परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी के शोधकर्ताओं ने हिमाचल प्रदेश के जिला किन्नौर व शिमला आदि के कुछ क्षेत्रों में अध्ययन किया गया। 140 सेब बगीचों की प्राकृतिक खेती और पारंपरिक खेती के 70-70 बगीचों में तुलना की गई। अध्ययन में विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की टीम में डॉ. दिव्यांशु, डॉ. सुभाष शर्मा, डॉ. राजेश्वर सिंह चंदेल, डॉ. रोहित वशिष्ट, डॉ. सुभाष चंद्र वर्मा, डॉ. अजय कुमार आदि ने भाग लिया। अध्ययन में प्राकृतिक खेती वाले बगीचों में जैविक कार्बन का स्तर 0.84 प्रतिशत से 1.95 प्रतिशत तक पाया गया, जबकि पारंपरिक खेती में यह 0.53 से 1.91 प्रतिशत तक था। प्राकृतिक खेती में नाइट्रोजन, फास्फोरस और सूक्ष्म पोषक तत्वों का स्तर भी अधिक था। हालांकि पोटेशियम का स्तर कम पाया गया। जिला किन्नौर के पूह और निचार ब्लॉकों में किए सूक्ष्म पोषक तत्व विश्लेषण से पता चला कि प्राकृतिक खेती के तहत जिंक, कॉपर, आयरन और मैंगनीज का स्तर पारंपरिक खेती की तुलना में अधिक था। निचार में परंपरागत के बजाय प्राकृतिक बागवानी वाले बगीचों में मिट्टी में इन पोषक तत्वों का स्तर अत्यधिक उच्च पाया गया। इससे मालूम हुआ कि प्राकृतिक खेती मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाने और पौधों के लिए जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता सुनिश्चित करने में अधिक प्रभावी रही है, जिससे फसल का बेहतर विकास, रोग प्रतिरोधक क्षमता और उच्च पैदावार पाई गई। प्राकृतिक खेती से कुल परिवर्तनीय लागतों में 46.76 प्रतिशत की उल्लेखनीय कमी आई। यह किसानों के लिए एक बड़ा आर्थिक लाभ है क्योंकि इससे उनकी शुद्ध आय में वृद्धि पाई गई। हालांकि, प्राकृतिक खेती में उपज में 1.59 प्रतिशत की मामूली वृद्धि देखी गई जो प्रति हेक्टेयर 161.25 क्विंटल रही। यह दर्शाता है कि लागत कम होने के बावजूद उत्पादन पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। अध्ययन में पाया गया कि प्राकृतिक खेती में वूली एफिड और लीफ फोल्डर जैसे कीट पारंपरिक खेती की तुलना में काफी अधिक पाए गए। उदाहरण के लिए जिला शिमला के चौपाल में वूली एफिड 30.43 प्रतिशत बनाम 20.92 प्रतिशत रहा। रसायनों का उपयोग न होने से पर्यावरण को लाभ
पूह में लीफ फोल्डर 41 प्रतिशत बनाम 5.5 प्रतिशत था। सैनजोस स्केल और एप्पल रूट बोरर में भी कुछ ब्लॉकों में प्राकृतिक खेती में अधिक प्रकोप देखा गया। हालांकि, प्राकृतिक खेती में रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग न होने से पर्यावरण को होने वाला नुकसान कम होता है और यह पारिस्थितिकी संतुलन को भी बढ़ावा देता है जो लंबी अवधि में कीटों के प्राकृतिक नियंत्रण में मदद कर सकता है। इन कीटों व बीमारियों को आग्नेयास्त्र, ब्रह्मास्त्र, नीमास्त्र जैसे वानस्पतिक जैव-कीटनाशकों से नियंत्रित किया जा सकता है। कैंकर, रूट रॉट और कॉलर रॉट आदि की प्राकृतिक खेती में कमी देखी गई। उदाहरण के लिए चौपाल में कॉलर रॉट प्राकृतिक बागवानी में 0.38 और परंपरागत बागवानी में 1.87 प्रतिशत रहा।












