कांगड़ा चित्र शैली का जीवंत उदाहरण है नर्वदेश्वर मंदिर
महाराजा संसार चंद के समय का ऐतिहासिक प्राचीन नर्वदेश्वर मंदिर सुजानपुर शहर में कांगड़ा चित्र शैली का जीवंत उदाहरण है। कहते हैं कि इसका पावन शिवलिंग नर्मदा नदी से लाया गया था। मंदिर के प्रांगण से दिखती नीचे की ओर बहती ब्यास नदी व धौलाधार पहाडिय़ों का मनमोहक नजारा इसे और भी सुंदर बनाते हैं। सुजानपुर शहर के बाजार के भीतर की ओर स्थापित मंदिर नर्वदेश्वर की दीवारों में उकेरी गई चित्रकला देश व प्रदेश में प्रसिद्ध है। चित्रकला में रामायण, महाभारत, कृष्ण लीला के प्रसंग हैं। इसके इलावा पहाड़, जंगल, बेल, बूटे घोड़े, हाथी आदि के दृश्य बड़े सुंदर ढंग से अंकित किए हैं। नगर के प्रसिद्ध मंदिर नर्वदेश्वर का निर्माण महाराजा संसार चंद की रानी प्रसन्नी देवी ने 1802 ई. में करवाया था। मंदिर व्यास नदी के किनारे एक पहाड़ी पर निर्मित है। इसमें मुगल-राजपूत की मिश्रित राजस्थानी शैली का प्रयोग हुआ है। कांगड़ा के प्रख्यात पहाड़ी चित्रकला के चितेरों मनकू, निक्का, नयनसुख आदि ने इस के भीतर दीवारों पर अद्भुत चित्रकारी की है जो अद्वितीय है। भगवान शिव को समर्पित होने के कारण इस मंदिर के अधिकतर चित्र भगवान शिव से संबंधित है। कहीं शिव भगवान का विवाह पार्वती के साथ दर्शाया गया है तो कहीं वे दोनों पहाड़ पर बैठे चित्रित किए गए हैं। साथ ही रामचंद्र भगवान से संबंधित विभिन्न मुद्राओं में सुंदर चित्रकारी है। राजा संसार चंद ने इस मंदिर के निर्माण में बहुत दिलचस्पी ली थी ऐसी धारणा है। महाराजा संसार चंद को कांगड़ा चित्र शैली को अंतरराष्ट्रीय ख्याति तक पहुंचाने का श्रेय जाता है। मंदिर के भीतर गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित किया गया है। कहते हैं की नर्मदा नदी के पावन स्थल से शिलिंग को लाया गया था तभी मंदिर का नाम नर्वदेश्वर मंदिर पड़ा। नर्वदेश्वर मंदिर हमीरपुर से 24 किलोमीटर दूर है, जबकि पालमपुर से यह मंदिर 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सुजानपुर के मुख्य बाजार से होकर वार्ड नंबर 2 में स्थित मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।