तिनन घाटी में मशालों के त्योहार हालडा पर्व की धूम
जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति में मशालों के त्योहार हालडा पर्व का आगाज हो गया है। इसी कड़ी में लाहौल की तिनन घाटी में हालडा पर्व की धूम है। पहले दिन ग्रामीणों ने जहां पूजा-अर्चना की और खुशहाली की कामना की। वहीं, रात को मशालें जलाकर आसुरी शक्तियां भगाई। मंगलवार रात को घाटी में हालडा के साथ ही नव वर्ष का आगाज हुआ और घरों से भूत प्रेतों व नकारात्मक चीजों को मशाल जलाकर बाहर निकाला। तिनन घाटी में यह त्योहार हर वर्ष रविवार या मंगलवार के दिन ही मनाया जाता है। इसी कड़ी इस बार बार भी मंगलवार को तिनन घाटी से इस पर्व का आगाज हुआ। सनद रहे कि नए साल में हालडा उत्सव जनजातीय लोगों का पहला त्योहार होता है, ऐसे में यहां के लोग हर वर्ष इस त्योहार को धूमधाम से मनाते हैं। इस अवसर पर लोगों ने पारंपरिक तरीके से पूजा-अर्चना करने के बाद रात के समय मशाल जलाई और पूरे क्षेत्र की खुशहाली की कामना की। रात्रि निश्चित समय पर हर घर से मशाल जला कर हालडो हालडो कहते हुए सभी पुरुष सफेद चादर पहनकर एक निश्चित स्थान पर पहुंचे। रात के समय सभी ने मशालों को बर्फ पर टिका कर जलाया। लोग चादरों में बर्फ समेटकर घर पहुंचे। रोचक यह रहा कि रीतिरिवाजों का निर्वहन करते हुए, जब लोग दरवाजे पर पहुंचे, तो अपने ही घरवालों ने उन्हें अंदर आने से रोक दिया। घर के सदस्य ने पूछा कि क्या ले कर आए हो तो मशाल फेंक कर आए व्यक्ति ने चादर में समेटे बर्फ को दिखाया और सौगात साथ लेकर आने की बात कही। घर में घी और सत्तू मिलाकर बलराज बनाया गया और उसे पूजा स्थल में रखा। इसे त्योहार खत्म होने के पश्चात खाया जाएगा। लिहाजा, अब तीन दिनों तक तिनन घाटी के लोग देवी-देवताओं की पूजा अर्चना में व्यस्त रहेंगे। विशेषकर राजा बलि की पूजा होगी और घरों में शोर शराबा भी नहीं होगा।
तीन-चार दिनों तक नहीं करते शोर-शराबा
मान्यता है कि इस समय देवी-देवता स्वर्ग प्रवास पर होते हैं, जिस कारण घाटी में आसुरी शक्तियों का प्रभाव होता है और इन आसुरी शक्तियों के प्रभाव से बचने के लिए ही रात के समय मशाल जलाई जाती है और इस दौरान यहां पर लोग दूसरे गांव के लोगों को अश्लील गालियां देते हैं। माना जाता है कि इससे बुरी शक्तियां अपना अपमान समझकर दूर भागती हैं। इस उत्सव के संपन्न होने के बाद लोग अपने घरों में तीन-चार दिन के लिए बंद हो जाते हैं। मान्यता के अनुसार यह लोग एक-दूसरे का मुंह तक नहीं देखते हैं। परिवार के लोग भी आपस में धीरे-धीरे बात करते हैं और कोई शोर-शराबा नहीं करते हैं। तीन-चार दिन के बाद लोग अपने घरों से निकलकर अपने रिश्तेदारों के यहां जाते हैं और हालडा उत्सव की बधाइयां देते हैं।