मंडल संगठनात्मक ढांचे में 'अपनी डफली, अपना राग' काबिज
हमीरपुर जिले में भाजपा के भीतर मंडल राजनीति में 'अपनी डफली अपना राग' आखिर काबिज हो ही गया। स्थानीय नेताओं को कई जगह अपना ताना-बाना बुनने में पूरी मशक्कत करनी पड़ी, कहीं आधी अधूरी, लेकिन जो भी हुआ, एक चीज की चमक अब दिखने लगी है कि भाजपा का कुनबा नए माहौल में ढलने लगा है। अच्छे खासे घमासान के बाद मंडल राजनीति में अध्यक्षों की ताजपोशी के बाद अब इसके नफे- नुकसान पर भी चर्चा शुरू हो गई है। पार्टी की भीतरी गुटबाजी का आधार धूमल और नड्डा खेमों के दरमियान बंटा हुआ है। दरअसल बिसात तो आगामी विधानसभा चुनावों की इन संगठनात्मक चुनावों के बहाने बिछाने का प्रयास हुआ है क्योंकि मंडल राजनीति परंपरागत नेताओं और आए हुए नए नेताओं के लिए अलग- अलग ढंग से महत्वपूर्ण हो चुकी है। इसलिए मंडलों के अध्यक्षों का चुनाव उनकी उम्मीदों पर कितना खरा उतरा और कितना नहीं, इस पर परंपरागत भाजपा के दरमियान ज्यादा चर्चा हो रही है। सुजानपुर विधानसभा क्षेत्र में हालात पर नए माहौल में कांग्रेस से आए पूर्व विधायक और ऑपरेशन लोटस के मुखिया कहे गए राजेंद्र राणा ने काबू पाने में कुछ देर तो लगाई, लेकिन मंडल अध्यक्षों की तैनाती के मामले में उन्होंने हालात को काबू में रखा। यहां असल समस्या यह है कि फिलहाल भाजपा से पिछले चुनावों में पार्टी प्रत्याशी रहे कै. रणजीत सिंह कांग्रेस में जाकर उपचुनाव में विधायक बने हैं। लिहाजा यहां इस विधानसभा क्षेत्र में वोटरों का घालमेल अजीबो गरीब मरहले में है। अब क्योंकि अगले चुनाव तक भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों में राजनीति के लिए समय लंबा है, इसलिए यहां नेताओं को बच-बचकर ही चलना पड़ेगा। राणा ने कुछ दिन पहले सेना दिवस पर बड़ा कार्यक्रम आयोजित कर एक बार फिर राजनीति में अपनी अलग 'धार' को दम दिखाने की हामी भरी है। हमीरपुर मंडल की राजनीति में इस बार मुकम्मल तौर पर फिर बदला हुआ है। मतलब साफ है कि यहां हालात बदल चुके हैं। परंपरागत नेताओं के लिए यहां अब ज्यादा जगह कहीं दिखती हो, ऐसा नजर नहीं आ रहा। हालांकि अभी भी अपनी मौजूदगी के एहसास को करवाने के लिए दम तो भर रहे हैं, मगर विधायक आशीष शर्मा ने मंडल अध्यक्षों के चुनाव में परंपरागतों की हरेक 'चाल' में खुद को अलग साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने एक चीज का एहसास निश्चित रूप में करवाया है कि अब परिस्थितियों बदल चुकी हैं। हमीरपुर विधानसभा क्षेत्र की राजनीति नई रणनीति के हिसाब से चलेगी। नादौन की मंडल राजनीति में विजय अग्निहोत्री की मौजूदगी बरकरार रही है। यही वजह रही कि जिला स्तर के चुनाव के समय ही उन्होंने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी और मंडल राजनीति में परंपरागत नेताओं के प्रभाव को उन्होंने आधार नहीं बनने दिया। भोरंज की राजनीति में पहले ही परिस्थितियों ने अपना रंग दिखा दिया था। लिहाजा उस क्षेत्र की राजनीति में पिछले विधानसभा चुनावों के समय से ही जो टेड़ापन आ चुका है। वह अब कब सीधा होगा? इसके लिए मंडल की राजनीति का ज्यादा प्रभाव पड़ेगा, ऐसा दिख नहीं रहा। वहां दो पूर्व विधायक कमलेश कुमारी और डॉ. अनिल धीमान अपने-अपने हिसाब से क्षेत्र की पार्टी राजनीति में सक्रिय हैं। बड़सर की राजनीति में एक बात क्लीयर हो गई है कि मौजूदा विधायक इंद्रदत्त लखनपाल किसी से भी ज्यादा पंगा लेने की स्थिति में नहीं दिख रहे। हालांकि वहां एक मंडल अध्यक्ष के चुनाव को लेकर खूब हो हल्ला हुआ था। मगर उसके रुके हुई प्रक्रिया को ही आगे अंजाम दिया गया और उसमें विधायक की सहमति की वजह से ही यशवीर पटियाल के नाम पर मुहर लगी।
पुरानी और नई भाजपा का मिश्रण किस करवट बैठेगा, इंतजार शुरू
अब देखना यही है कि जिला अध्यक्ष कार्यकारिणी को लेकर भाजपा के कुनबे को किस सूत्र में बांधने में कामयाब होते हैं। उनका तो तुजुर्बा जिला भाजपा के पदाधिकारी के रूप में शुरू से ही बेहतर रहा है, लेकिन देखना यही होगा कि अन्य नेताओं की उमीद पर हुए अब कार्यकारिणी के निर्माण में कितना खरा उतरते हैं, क्योंकि नए आए नेता इस जिला की राजनीति में नए घोड़े की सवारी पर हैं। इसलिए पुरानी भाजपा और नई का यह मिश्रण किस करवट बैठेगा, इसका इंतजार शुरू हो गया है।