15 फुट ऊंचा बर्फ का बनाया शिवलिंग
जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति में इनदिनों स्नो फेस्टिवल का आयोजन किया गया। इसी कड़ी में मडग्रां गांव में योर उत्सव की खूब धूम मची हुई है। योर उत्सव की सांस्कृतिक-पारंपरिक अनुष्ठान के रूप में अपनी विशिष्टताएं हैं। मडग्रां योर में लगभग 15 फुट ऊंचा बर्फ का शिवलिंग बनाया जाता है व हर साल की तरह इस बार भी पारंपरिक रूप से इसकी पूजा-अर्चना की जाती है। साथ ही सामूहिक रूप से पारंपरिक नृत्य शैली में इसके चारों तरफ परिक्रमा करते हुए पारंपरिक वेशभूषा में मुखौटा पहनकर प्रकृति की पूजा की जाती है। इसमें प्रार्थना के साथ यौरा (जौ की अंकुरित डालियां) फेंकी जाती हैं। यह परंपरा दोपहर तक पूरी की गई। दोपहर बाद दोबारा लोग एकत्र होते हैं तथा पुरातन वाद्ययंत्रों की ताल पर सामूहिक नृत्य करते हैं। मडग्रां का योर सर्दियों के मौसम की विदाई समारोह के रूप में लोगों ने भविष्य के लिए अच्छी फसल व खुशहाली की कामना के रूप में भी मनाया जाता है। लोग यहां योर उत्सव सदियों से मनाते आ रहे हैं। यह उत्सव पहले मूलिंग गांव से शुरू होकर मडग्रां में समाप्त होता है।
देवताओं की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि का ले रहे आशीर्वाद
लाहौल घाटी के मडग्रां में योर उत्सव की धूम मची हुई है। ग्रामीण वीर देवता, काली मां, मृकुला भवानी मां, बुहारी देवता और नाग देवता की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद ले रहे हैं। रविवार और सोमवार को रस्मों की अदायगी हुई। यह देव कार्यक्रम सबके आकर्षण का केंद्र रहे। इस दौरान मुखौटा नृत्य आकर्षण का केंद्र रहा। सोमवार को ग्रामीणों ने बर्फ के शिवलिंग के चारों और वाद्ययंत्रों की धुन पर थिरकते हुए परिक्रमा की। इसके साथ ही ईष्ट देवी-देवताओं सहित पितरों का नाम पुकार कर उन्हें जूब (यौरा) भी समर्पित किया। लाहौल के इतिहासकार मोहन लाल रेलिंग्पा ने कहा कि विरासत में मिली इस अमूल्य व विचित्र सांस्कृतिक धरोहर को आज संरक्षण प्रदान करने की आवश्यकता है। मडग़्रां यौर गांव में बर्फ का विशाल शंकु, जिसे राश कहा जाता है, बनाकर मनाया गया। इस उत्सव से संबद्ध अनुष्ठान, नृत्य, खेल आदि इसी पर केंद्रित रहे। मडग्रा यौर में सभी देवों के साथ मृकुला भगवती तथा वीर कैलाश की भी पूजा की गई। मडग्रां यौर में पितरों के नाम से पुग, भुने जो के दाने और लुगड़ी अर्पित की गई। लोगों ने अपनी वंशावली की सूचियां लेकर शुर यौरा अर्पित किया। नृत्य के दौरान डोमणी बोमणी ताल वाद्य तथा पाऊंन बजाया गया।