चंबा में अनोखी परंपरा से मनाया लोहड़ी का त्योहार
समस्त उत्तरी भारत में हर जगह लोहड़ी का त्योहार बड़ी ही श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन चंबा मुख्यालय (सदर) में इस त्यांहार को मानने की परंपरा बिलकुल ही अलग तथा अनूठी है। सदियों से राजाओं के कार्यकाल से चली आ रही एक हजार वर्ष प्राचीन इस परंपरा को चंबा के स्थानीय लोग आज भी उसी लहजे से मानते चले आ रहे हैं। यह है एक हजार वर्ष प्राचीन नगरी जिसको की चंबा के नाम से जाना जाता है। राजा साहिल वर्मन ने दसवीं शताब्दी ब्रह्मपुरख भरमौर से आकर इस रियासत को बसाया था। पर यहां पहुंचकर देखा तो इस स्थान में भूत-प्रेतों का अधिकतर बसेरा हुआ करता था, जिससे उनकी प्रजा परेशान रहने लगी तथा इन भूत-प्रेतों से कैसे बचें और इससे कैसे निजात पाई जाए और मुक्ति मिले शहर के हर कोने-कोने में 14 मढिय़ों की स्थापना कर दी। जिनको की लोग लगातार एक महीना रात के समय जलाते थे और उसकी देख-रेख मोहल्ले में बसे सभी बूढ़े और बच्चे किया करते थे। ऐसा करने से भूत-प्रेतों के आतंक तो समाप्त हुआ। वहीं, साथ में शांति भी कायम हो गई। सैकड़ों वर्ष से चली आ रही यह अद्भुत प्रथा जिसको कि आज भी चंबा के स्थानीय लोग बड़ी धूमधाम से मनाते चले आ रहे हैं। इसकी शुरुआत सबसे पहले राजस्वी मोहल्ला सुराड़ा के भगवान शिव के मंदिर से की जाती है। इस मंदिर से एक लकड़ी नुमा त्रिशूल जिसको की मशाल यानी मुशहरा कहा जाता है, बनाया जाता है। जिसकी विधिवत तरीके से पूजा कर बैंड-बाजे के साथ मढिय़ों में डूबने की तैयारी की जाती है। इसी के साथ चौंतड़ा मोहल्ला में भी इसी तरह का एक और मशाल यानी की मशाहरा तैयार किया जाता है, जो बजीर मुशहरा के नाम से जाना जाता है। रात ठीक 11 बजे राज मुशहरे को कई लोग अपने कंधे पर उठा आगे के लिए चल पड़ते हैं। दूसरी तरफ से बजीर मढ़ी से भी मुशाहरा चल पड़ता है और एक जगह पर इन दोनों का मिलन करवाया जाता है, जहां पर लोग खूब शोर-शराबा मचाते हैं। बाद में बजीर वापस अपनी मढ़ी में चला जाता है और राज मशाहरा पूरे शहर की मढिय़ों में डुबाया जाया है जिसे चंबा की सुख और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। चंबा में इस तरह की अनोखी लोहड़ी अपने में एक अलग ही इतिहास को दर्शाती है।
चंबा शहर में भूत-प्रेतों का हुआ करता था वास
इस बारे चंबा के प्रबुद्ध स्थानीय लोगों का कहना है कि राजाओं द्वारा चंबा शहर जब बसाया गया तो उस समय यहां भूत-प्रेतों का वास हुआ करता था। दैत्य शहर के लोगों को मार दिया करते थे। इस बात से परेशान हो राजा ने बाहर के राज्यों से तांत्रिक को बुलाया। तांत्रिकों ने यह उपाय बताया कि भूत-प्रेतों को हर हफ्ते किसी एक की नर बलि दी जाए, लेकिन इसके लिए कोई भी तैयार नहीं हो रहा था। राजा ने फिर एक बार इस समस्या के हल के लिए विद्वानों को बुलाया। विद्वानों के अनुसार यह तय किया गया कि हर साल यहां राक्षसों को मनुष्य का खून दिया जाएगा और इसके लिए उन्होंने लोहड़ी पर्व को कुछ अलग तरीके से मनाने का फैसला किया। शहर में 14 मोहल्लों में अलग- अलग मढिय़ां स्थापित की गई, जिन में 7 पुरुषों की और 7 महिलाओं की मढिय़ां बनाई गई। आज भी इस प्रथा को चंबा के छोटे-बड़े लोग बड़ी खुशी-खुशी मनाते हैं और अपनी-अपनी मढिय़ों में बड़े बड़े लकडिय़ों के ठेलों को जलाते हुए नाचते गाते दिखाई देते हैं। इस पर परंपरा का निर्वहन सदियों से आज तक होता चला आ रहा है।