अंडरग्राउंड लाइनों में नहीं दौड़ा करंट
हमीरपुर शहर में बिजली व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए अंडरग्राउंड केबल लाइन बिछाने की योजना एक बार फिर चर्चा में है। सरकार ने इसकी घोषणा भी की हुई है, लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि करीब 7 साल पहले अणू से शहर तक जो अंडरग्राउंड केबल डाली गई थी, उसका फायदा शहर वासियों को आखिर क्यों नहीं मिल पाया। लाखों रुपए खर्च करने के बावजूद भी योजना को अधूरा क्यों छोड़ा गया? किन अधिकारियों की वजह से यह बड़ी लापरवाही हुई है। न तो इसकी जांच हुई और न ही सुविधा मिली। इसीलिए बिजली बोर्ड की कारगुजारी यहां चर्चा में है। दरअसल बिजली व्यवस्था को सुधारने के लिए जिस अणू सब-स्टेशन से हमीरपुर को बिजली व्यवस्था के साथ जोड़ा गया है, उसके मध्य में चीड़ के पेड़ बारबार रुकावट बनते हैं। बरसात के मौसम में लोग अक्सर इसका खामियाजा भी भुगतते हैं। इसीलिए अंडरग्राउंड केबल लाइन डालने की योजना को अमलीजामा पहनाया गया था, लेकिन यह योजना फाइलों तक ही सिमट कर रह गई और लाखों रुपए खर्च करके बोर्ड की माली हालत को नुकसान पहुंचाने के लिए उस समय के अधिकारियों ने भी अपना योगदान देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। 2014-15 में शुरू हुआ था काम : शहर में अलग-अलग तीन फीडर के लिए यह अंडरग्राउंड लाइनें बिछाने का काम 2014-15 में शुरू हुआ था, जिसमें हाउसिंग बोर्ड फीडर, हमीरपुर फीडर और हीरानगर फीडर के लिए तकरीबन तीन करोड़ रुपए खर्च किए गए थे। कुल मिलाकर जिले के अन्य इलाकों में भी इस तरह का काम हुआ और 6 करोड़ रुपए एक्सएलपी योजना के तहत खर्च गए थे, लेकिन तीनों फीडर्स की अंडरग्राउंड लाइनें फाइलों तक ही सीमित रहीं, सुविधा नहीं मिली।
शहर की बिजली व्यवस्था 'हिचकोले' खाती रहेगी
अब सरकार ने 20 करोड़ से शहर के कुछ हिस्से में अंडरग्राउंड केबल लाइन डालने की योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए अधिकारियों को आगे किया हुआ है। इस पर काम हो रहा है, वह व्यावहारिक नहीं दिखता क्योंकि मुख्य शहर में यदि गांधी चौक से लेकर पुरानी सब्जी मंडी तक इसे भूमिगत करना ही है, तो फिर शहर की मुख्य सड़क जो पहले ही जर्जर है। इसमें कई तरह की केबल लाइनें अलग-अलग कंपनियों की बिछाई गई हैं। इसके अलावा इस तंग सड़क में सीवरेज भी डाली गई है। जगह तो कोई बची नहीं है, फिर भूमिगत बिजली लाइन बिछेगी कैसे? यह कारण भी कोई नहीं बताता। पहले डाली गई केबल लाइन भी सवालों में है। नई की प्रपोजल तैयार हो गई है, मगर सरकार को कोई बताने वाला अधिकारी नहीं है, जो इसकी वास्तविकता पर बात कर इस योजना को किसी और तरीके से अमलीजामा पहनाने के लिए राजी करवा ले। खैर, जो भी हो, संजीदा कोई भी अधिकारी या राजनेता नहीं दिखता। केवल हां में हां मिलाने की योजना पर काम हो रहा है। यहां हो क्या सकता? इस बारे कोई भी प्रपोजल बनाने के लिए आगे नहीं आ रहा। इसीलिए इस शहर की बिजली व्यवस्था 'हिचकोले' खाती रहेगी।
व्यवस्था को चिढ़ा रही भूमिगत लाइन
करीब एक किमी लंबी इस लाइन को अणू सब-स्टेशन से हीरानगर से होते हुए शहर तक लाया गया था। इसका मतलब यही था कि बरसात के मौसम में भी शहर की बिजली व्यवस्था को बगैर किसी रुकावट के बेहतर बनाए रखना था, लेकिन इसे नहीं जोड़ा गया। यह भूमिगत लाइन अभी भी व्यवस्था को 'चिढ़ा' रही है।