जनवरी माह में मात्र दो बार बरसे बादल वह भी नाकाफी, फसलों को नुकसान
हिमाचल प्रदेश में जिस तरह से पश्चिमी विक्षोभ का बेअसर हो रहा है, इससे किसानों व बागवानों की चिंता बढऩे लगी है क्योंकि क्षेत्र की मुख्य नकदी फसल सेब के जिस तरह की बर्फबारी व वर्षा वांछित होती है, उस तरह का माहौल सेब के बागानों को नहीं मिल पाया है। सेब के बागानों में एक डेढ़ महीने तक बर्फ रहने से वहां पनपने वालेकीटों व वायरस से पौधों को सुरक्षा मिलती रही है, लेकिन अब जिस तरह से ग्लोबल वार्मिंग अपने तेवर दिखा रही है, उससे सेब के बा गानों में बर्फ पडऩा न के बराबर हो गई है। नतीजनन सेब के पौधों में मिट्टी में पाए जाने वाले कीड़ों की संख्या में वर्ष दर वर्ष बढ़ोतरी होने से पौधे सूखकर धराशायी होने लगे हैं। आजकल बागवान सेब के बागानों में कई प्रकार की खादों को डालने लगे हैं, लेकिन जब वह सेब के बेसिन की खुदाई कर रहे हैं, तो उसमें भारी संख्या में कीड़े निकल रहे हैं, जो पौधों की जड़ों को खाकर पौधों को सुखने पर मजबूर कर रहे हैं।
बर्फबारी की चादर न पहुंचने से कीटों का बढ़ा प्रकोप
बागवान मोहन कपूर, विकास, जयराम, जगदीश, अंनत राम, विक्रम, संजय ठाकुर, सुदर्शन ठाकुर आदि ने बताया कि आजकल सेब के बागानों में सेब के पौधों की काट-छांट व जैविक व रासायनिक खादों क डालने का कार्य प्रगति पर है, लेकिन जब बागानों में सेब के बेसिन की खुदाई को तरजीह दे रहे हैं, तो उसमें रूट बोरर, जो कि पौधों की जड़ों को खाकर उसे खोखला कर रहे हैं उन कीड़ों का प्रकोप चरम पर है। बागानों तक बर्फबारी की चादर न पहुंचने से कीटों का प्रकोप बढ़ रहा है, जिससे सेब के पौधे धराशायी होने लगे हैं। लोगों का मानना है कि सर्दी के मौसम में बर्फबारी की कमी से बागवानों को इस समस्या से जुझना पड़ रहा है। हालांकि बागवान इसकी रोकथाम के लिए कई प्रकार की कीटनाशक दवाइयों का उपयोग कर रहें हैं, लेकिन पूरी तरह से इन कीटों से निजात पाने मे असमर्थ हैं। बागवानों के अनुसार पिछले तीन चार वर्षों से अक्तूबर से जनवरी तक बर्फबारी की कमी के कारण सेब के बागानों व खेतों में इन कीटों की बढ़ती संख्या से फसलों को भी नुकसान पहुंच रहा हैं। जनवरी के महीने में मात्र दो दिन वर्षा हुई है, मगर बर्फबारी समुद्र तल से 7 हजार फुट की ऊंचाई से नीचे नहीं उतरी।